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title: "किष्किन्धाकाण्ड दोहा 30b"
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# किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 30b

श्रीरामगुणका माहात्म्य

**चौ०** 
> अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥  
> जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक॥.१ ॥

भावार्थ: अंगदने कहा—मैं पार तो चला जाऊँगा। परन्तु लौटते समयके लिये हृदयमें कुछ सन्देह है। जाम्बवान्‌ने कहा—तुम सब प्रकारसे योग्य हो। परन्तु तुम सबके नेता हो, तुम्हें कैसे भेजा जाय?॥ १ ॥

**चौ०** 
> कहइ रीक्षपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥  
> पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥२॥

भावार्थ: ऋक्षराज जाम्बवान्‌ने श्रीहनुमान्‌जीसे कहा—हे हनुमान्! हे बलवान्! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है? तुम पवनके पुत्र हो और बलमें पवनके समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञानकी खान हो॥ २ ॥

**चौ०** 
> कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥  
> राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥३॥

भावार्थ: जगत्‌में कौन-सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्रीरामजीके कार्यके लिये ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्‌जी पर्वतके आकारके ( अत्यन्त विशालकाय ) हो गये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥  
> सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा॥४॥

भावार्थ: उनका सोनेका-सा रंग है, शरीरपर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतोंका राजा सुमेरु हो। हनुमान्‌जीने बार-बार सिंहनाद करके कहा—मैं इस खारे समुद्रको खेलमें ही लाँघ सकता हूँ॥ ४ ॥

**चौ०** 
> सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥  
> जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥५॥

भावार्थ: और सहायकोंसहित रावणको मारकर त्रिकूट पर्वतको उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान्! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना [ कि मुझे क्या करना चाहिये ]॥ ५ ॥

**चौ०** 
> एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥  
> तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥६॥

भावार्थ: [ जाम्बवान्‌ने कहा— ] हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजीको देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्रीरामजी अपने बाहुबलसे [ ही राक्षसोंका संहार कर सीताजीको ले आयेंगे, केवल ] खेलके लिये ही वे वानरोंकी सेना साथ लेंगे॥ ६ ॥

**छं०** 
> कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।  
> त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं॥  
> जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।  
> रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥

भावार्थ: वानरोंकी सेना साथ लेकर राक्षसोंका संहार करके श्रीरामजी सीताजीको ले आयेंगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान्‌के तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाले सुन्दर यशका बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझनेसे मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्रीरघुवीरके चरणकमलका मधुकर ( भ्रमर ) तुलसीदास गाता है।

**दो०** 
> भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।  
> तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥३० (क)॥

भावार्थ: श्रीरघुवीरका यश भव ( जन्म-मरण )-रूपी रोगकी [ अचूक ] दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिराके शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथोंको सिद्ध करेंगे॥ ३० ( क )॥

**सो०** 
> नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।  
> सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥३० (ख)॥

भावार्थ: जिनका नीले कमलके समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियोंके मारनेके लिये बधिक ( व्याध ) के समान है, उन श्रीरामके गुणोंके समूह ( लीला ) को अवश्य सुनना चाहिये॥ ३० ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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