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title: "किष्किन्धाकाण्ड दोहा 29"
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# किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 29

**चौ०** 
> जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर॥  
> मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा॥१॥

भावार्थ: जो सौ योजन ( चार सौ कोस ) समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा वही श्रीरामजीका कार्य कर सकेगा। [ निराश होकर घबराओ मत ] मुझे देखकर मनमें धीरज धरो। देखो, श्रीरामजीकी कृपासे [ देखते-ही-देखते ] मेरा शरीर कैसा हो गया ( बिना पाँखका बेहाल था, पाँख उगनेसे सुन्दर हो गया )!॥ १ ॥

**चौ०** 
> पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं॥  
> तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई॥२॥

भावार्थ: पापी भी जिनका नाम स्मरण करके अत्यन्त अपार भवसागरसे तर जाते हैं, तुम उनके दूत हो, अतः कायरता छोड़कर श्रीरामजीको हृदयमें धारण करके उपाय करो॥ २ ॥

**चौ०** 
> अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ॥  
> निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा॥३॥

भावार्थ: [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं— ] हे गरुड़जी! इस प्रकार कहकर जब गीध चला गया, तब उन ( वानरों ) के मनमें अत्यन्त विस्मय हुआ। सब किसीने अपना-अपना बल कहा! पर समुद्रके पार जानेमें सभीने सन्देह प्रकट किया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा॥  
> जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी॥४॥

भावार्थ: ऋक्षराज जाम्बवान्‌ कहने लगे—मैं अब बूढ़ा हो गया। शरीरमें पहलेवाले बलका लेश भी नहीं रहा। जब खरारि ( खरके शत्रु श्रीराम ) वामन बने थे, तब मैं जवान था और मुझमें बड़ा बल था॥ ४ ॥

**दो०** 
> बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ।  
> उभय घरी महँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ॥२९॥

भावार्थ: बलिके बाँधते समय प्रभु इतने बढ़े कि उस शरीरका वर्णन नहीं हो सकता, किन्तु मैंने दो ही घड़ीमें दौड़कर [ उस शरीरकी ] सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं॥ २९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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