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title: "किष्किन्धाकाण्ड दोहा 27"
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# किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 27

**चौ०** 
> एहि बिधि कथा कहहिं बहु भाँती। गिरि कंदराँ सुनी संपाती॥  
> बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा॥१॥

भावार्थ: इस प्रकार जाम्बवान्‌ बहुत प्रकारसे कथाएँ कह रहे हैं। इनकी बातें पर्वतकी कन्दरामें सम्पातीने सुनीं। बाहर निकलकर उसने बहुत-से वानर देखे। [ तब वह बोला— ] जगदीश्वरने मुझको घर बैठे बहुत-सा आहार भेज दिया!॥ १ ॥

**चौ०** 
> आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ॥  
> कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा॥२॥

भावार्थ: आज इन सबको खा जाऊँगा। बहुत दिन बीत गये, भोजनके बिना मर रहा था। पेटभर भोजन कभी नहीं मिलता। आज विधाताने एक ही बारमें बहुत-सा भोजन दे दिया॥ २ ॥

**चौ०** 
> डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना॥  
> कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी॥३॥

भावार्थ: गीधके वचन कानोंसे सुनते ही सब डर गये कि अब सचमुच ही मरना हो गया, यह हमने जान लिया। फिर उस गीध ( सम्पाती ) को देखकर सब वानर उठ खड़े हुए। जाम्बवान्‌के मनमें विशेष सोच हुआ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं॥  
> राम काज कारन तनु त्यागी। हरि पुर गयउ परम बड़भागी॥४॥

भावार्थ: अंगदने मनमें विचारकर कहा—अहा! जटायुके समान धन्य कोई नहीं है। श्रीरामजीके कार्यके लिये शरीर छोड़कर वह परम बड़भागी भगवान्‌के परमधामको चला गया॥ ४ ॥

**चौ०** 
> सुनि खग हरष सोक जुत बानी। आवा निकट कपिन्ह भय मानी॥  
> तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई॥५॥

भावार्थ: हर्ष और शोकसे युक्त वाणी ( समाचार ) सुनकर वह पक्षी ( सम्पाती ) वानरोंके पास आया। वानर डर गये। उनको अभय करके ( अभय-वचन देकर ) उसने पास जाकर जटायुका वृत्तान्त पूछा, तब उन्होंने सारी कथा उसे कह सुनायी॥ ५ ॥

**चौ०** 
> सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी॥६॥

भावार्थ: भाई जटायुकी करनी सुनकर सम्पातीने बहुत प्रकारसे श्रीरघुनाथजीकी महिमा वर्णन की॥ ६ ॥

**दो०** 
> मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि।  
> बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि॥२७॥

भावार्थ: [ उसने कहा— ] मुझे समुद्रके किनारे ले चलो, मैं जटायुको तिलाञ्जलि दे दूँ। इस सेवाके बदले मैं तुम्हारी वचनसे सहायता करूँगा ( अर्थात्‌ सीताजी कहाँ हैं सो बतला दूँगा ) जिसे तुम खोज रहे हो उसे पा जाओगे॥ २७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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