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title: "किष्किन्धाकाण्ड दोहा 26"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/kishkindha-kand/doha-26"
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# किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 26

**चौ०** 
> इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काजु कछु नाहीं॥  
> सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता॥१॥

भावार्थ: यहाँ वानरगण मनमें विचार कर रहे हैं कि अवधि तो बीत गयी; पर काम कुछ न हुआ। सब मिलकर आपसमें बात करने लगे कि हे भाई! अब तो सीताजीकी खबर लिये बिना लौटकर भी क्या करेंगे?॥१॥

**चौ०** 
> कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी॥  
> इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई॥२॥

भावार्थ: अंगदने नेत्रोंमें जल भरकर कहा कि दोनों ही प्रकारसे हमारी मृत्यु हुई। यहाँ तो सीताजीकी सुध नहीं मिली और वहाँ जानेपर वानरराज सुग्रीव मार डालेंगे॥२॥

**चौ०** 
> पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही॥  
> पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं॥३॥

भावार्थ: वे तो पिताके वध होनेपर ही मुझे मार डालते। श्रीरामजीने ही मेरी रक्षा की, इसमें सुग्रीवका कोई एहसान नहीं है। अंगद बार-बार सबसे कह रहे हैं कि अब मरण हुआ, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है॥३॥

**चौ०** 
> अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा॥  
> छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस बचन कहत सब भए॥४॥

भावार्थ: वानर वीर अंगदके वचन सुनते हैं; किन्तु कुछ बोल नहीं सकते। उनके नेत्रोंसे जल बह रहा है। एक क्षणके लिये सब सोचमें मग्न हो रहे। फिर सब ऐसा वचन कहने लगे— ॥४॥

**चौ०** 
> हम सीता कै सुधि लीन्हें बिना। नहिं जैहैं जुबराज प्रबीना॥  
> अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई॥५॥

भावार्थ: हे सुयोग्य युवराज! हमलोग सीताजीकी खोज लिये बिना नहीं लौटेंगे। ऐसा कहकर लवणसागरके तटपर जाकर सब वानर कुश बिछाकर बैठ गये॥५॥

**चौ०** 
> जामवंत अंगद दुख देखी। कहीं कथा उपदेस बिसेषी॥  
> तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु॥६॥

भावार्थ: जाम्बवान्‌ने अंगदका दुःख देखकर विशेष उपदेशकी कथाएँ कहीं। [ वे बोले— ] हे तात! श्रीरामजीको मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो॥६॥

**चौ०** 
> हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी॥७॥

भावार्थ: हम सब सेवक अत्यन्त बड़भागी हैं, जो निरन्तर सगुण ब्रह्म ( श्रीरामजी ) में प्रीति रखते हैं॥७॥

**दो०** 
> निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।  
> सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि॥२६॥

भावार्थ: देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणोंके लिये प्रभु अपनी इच्छासे [ किसी कर्मबन्धनसे नहीं ] अवतार लेते हैं। वहाँ सगुणोपासक [ भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य ] सब प्रकारके मोक्षोंको त्यागकर उनकी सेवामें साथ रहते हैं॥ २६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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