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title: "किष्किन्धाकाण्ड दोहा 25"
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# किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 25

गुफामें तपस्विनीके दर्शन · वानरोंका समुद्रतटपर आना, सम्पातीसे भेंट और बातचीत

**चौ०** 
> दूरि ते ताहि सबन्हि सिरु नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा॥  
> तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना॥१॥

भावार्थ: दूरसे ही सबने उसे सिर नवाया और पूछनेपर अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया। तब उसने कहा—जलपान करो और भाँति-भाँतिके रसीले सुन्दर फल खाओ॥१॥

**चौ०** 
> मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए॥  
> तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई॥२॥

भावार्थ: [ आज्ञा पाकर ] सबने स्नान किया, मीठे फल खाये और फिर सब उसके पास चले आये। तब उसने अपनी सब कथा कह सुनायी [ और कहा— ] मैं अब वहाँ जाऊँगी जहाँ श्रीरघुनाथजी हैं॥२॥

**चौ०** 
> मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू॥  
> नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा॥३॥

भावार्थ: तुमलोग आँखें मूँद लो और गुफाको छोड़कर बाहर जाओ। तुम सीताजीको पा जाओगे, पछताओ नहीं ( निराश न होओ )। आँखें मूँदकर फिर जब आँखें खोलीं तो सब वीर क्या देखते हैं कि सब समुद्रके तीरपर खड़े हैं॥३॥

**चौ०** 
> सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा॥  
> नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही॥४॥

भावार्थ: और वह स्वयं वहाँ गयी जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। उसने जाकर प्रभुके चरणकमलोंमें मस्तक नवाया और बहुत प्रकारसे विनती की। प्रभुने उसे अपनी अनपायिनी ( अचल ) भक्ति दी॥४॥

**दो०** 
> बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस।  
> उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस॥२५॥

भावार्थ: प्रभुकी आज्ञा सिरपर धारणकर और श्रीरामजीके युगल चरणोंको, जिनकी ब्रह्मा और महेश भी वन्दना करते हैं, हृदयमें धारणकर वह ( स्वयंप्रभा ) बदरिकाश्रमको चली गयी॥२५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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