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title: "किष्किन्धाकाण्ड दोहा 20"
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# किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 20

**चौ०** 
> चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही॥  
> क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना॥१॥

भावार्थ: अंगदने उनके चरणोंमें सिर नवाकर विनती की ( क्षमायाचना की )। तब लक्ष्मणजीने उनको अभय बाँह दी ( भुजा उठाकर कहा कि डरो मत )। सुग्रीवने अपने कानोंसे लक्ष्मणजीको क्रोधयुक्त सुनकर भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर कहा— ॥१॥

**चौ०** 
> सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा॥  
> तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना॥२॥

भावार्थ: हे हनुमान्‌! सुनो, तुम ताराको साथ ले जाकर विनती करके राजकुमारको समझाओ ( समझा-बुझाकर शान्त करो )। हनुमान्‌जीने तारासहित जाकर लक्ष्मणजीके चरणोंकी वन्दना की और प्रभुके सुन्दर यशका बखान किया॥२॥

**चौ०** 
> करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए॥  
> तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा॥३॥

भावार्थ: वे विनती करके उन्हें महलमें ले आये तथा चरणोंको धोकर उन्हें पलँगपर बैठाया। तब वानरराज सुग्रीवने उनके चरणोंमें सिर नवाया और लक्ष्मणजीने हाथ पकड़कर उनको गलेसे लगा लिया॥३॥

**चौ०** 
> नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं॥  
> सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा॥४॥

भावार्थ: [ सुग्रीवने कहा— ] हे नाथ! विषयके समान और कोई मद नहीं है। यह मुनियोंके मनमें भी क्षणमात्रमें मोह उत्पन्न कर देता है [ फिर मैं तो विषयी जीव ही ठहरा ]। सुग्रीवके विनययुक्त वचन सुनकर लक्ष्मणजीने सुख पाया और उनको बहुत प्रकारसे समझाया॥४॥

**चौ०** 
> पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई॥५॥

भावार्थ: तब पवनसुत हनुमान्‌जीने जिस प्रकार सब दिशाओंमें दूतोंके समूह गये थे वह सब हाल सुनाया॥५॥

**दो०** 
> हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ।  
> रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ॥ २०॥

भावार्थ: तब अंगद आदि वानरोंको साथ लेकर और श्रीरामजीके छोटे भाई लक्ष्मणजीको आगे करके ( अर्थात्‌ उनके पीछे-पीछे ) सुग्रीव हर्षित होकर चले और जहाँ रघुनाथजी थे वहाँ आये॥ २० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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