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title: "किष्किन्धाकाण्ड दोहा 19"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/kishkindha-kand/doha-19"
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# किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 19

**चौ०** 
> इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥  
> निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥१॥

भावार्थ: यहाँ ( किष्किन्धानगरीमें ) पवनकुमार श्रीहनुमान्‌जीने विचार किया कि सुग्रीवने श्रीरामजीके कार्यको भुला दिया। उन्होंने सुग्रीवके पास जाकर चरणोंमें सिर नवाया। [ साम, दान, दण्ड, भेद ] चारों प्रकारकी नीति कहकर उन्हें समझाया॥१॥

**चौ०** 
> सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना॥  
> अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा॥ २॥

भावार्थ: हनुमान्‌जीके वचन सुनकर सुग्रीवने बहुत ही भय माना। [ और कहा— ] विषयोंने मेरे ज्ञानको हर लिया। अब हे पवनसुत! जहाँ-तहाँ वानरोंके यूथ रहते हैं; वहाँ दूतोंके समूहोंको भेजो॥२॥

**चौ०** 
> कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई॥  
> तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता॥३॥

भावार्थ: और कहला दो कि एक पखवाड़ेमें ( पंद्रह दिनोंमें ) जो न आ जायगा, उसका मेरे हाथों वध होगा। तब हनुमान्‌जीने दूतोंको बुलाया और सबका बहुत सम्मान करके— ॥३॥

**चौ०** 
> भय अरु प्रीति नीति देखराई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई॥  
> एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए॥ ४॥

भावार्थ: सबको भय, प्रीति और नीति दिखलायी। सब बंदर चरणोंमें सिर नवाकर चले। इसी समय लक्ष्मणजी नगरमें आये। उनका क्रोध देखकर बंदर जहाँ-तहाँ भागे॥४॥

**दो०** 
> धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार।  
> ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार॥१९॥

भावार्थ: तदनन्तर लक्ष्मणजीने धनुष चढ़ाकर कहा कि नगरको जलाकर अभी राख कर दूँगा। तब नगरभरको व्याकुल देखकर बालिपुत्र अंगदजी उनके पास आये॥१९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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