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title: "किष्किन्धाकाण्ड दोहा 14"
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# किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 14

**चौ०** 
> घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥  
> दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥१॥

भावार्थ: आकाशमें बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया ( सीताजी ) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजलीकी चमक बादलोंमें ठहरती नहीं, जैसे दुष्टकी प्रीति स्थिर नहीं रहती॥१॥

**चौ०** 
> बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ॥  
> बूँद अघात सहहिं गिरि कैसें। खल के बचन संत सह जैसें॥२॥

भावार्थ: बादल पृथ्वीके समीप आकर ( नीचे उतरकर ) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान्‌ नम्र हो जाते हैं। बूँदोंकी चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टोंके वचन संत सहते हैं॥२॥

**चौ०** 
> छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥  
> भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥३॥

भावार्थ: छोटी नदियाँ भरकर [ किनारोंको ] तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धनसे भी दुष्ट इतरा जाते हैं ( मर्यादाका त्याग कर देते हैं )। पृथ्वीपर पड़ते ही पानी गँदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीवके माया लिपट गयी हो॥३॥

**चौ०** 
> समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥  
> सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥४॥

भावार्थ: जल एकत्र हो-होकर तालाबोंमें भर रहा है, जैसे सद्‌गुण [ एक-एककर ] सज्जनके पास चले आते हैं। नदीका जल समुद्रमें जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्रीहरिको पाकर अचल ( आवागमनसे मुक्त ) हो जाता है॥४॥

**दो०** 
> हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।  
> जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥१४॥

भावार्थ: पृथ्वी घाससे परिपूर्ण होकर हरी हो गयी है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखण्ड-मतके प्रचारसे सद्‌ग्रन्थ गुप्त ( लुप्त ) हो जाते हैं॥१४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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