---
title: "किष्किन्धाकाण्ड दोहा 10"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/kishkindha-kand/doha-10"
lang: "hi"
---

# किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 10

**चौ०** 
> सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी॥  
> अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना॥१॥

भावार्थ: बालिकी अत्यन्त कोमल वाणी सुनकर श्रीरामजीने उसके सिरको अपने हाथसे स्पर्श किया [ और कहा— ] मैं तुम्हारे शरीरको अचल कर दूँ, तुम प्राणोंको रखो। बालिने कहा—हे कृपानिधान! सुनिये— ॥ १ ॥

**चौ०** 
> जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥  
> जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥२॥

भावार्थ: मुनिगण जन्म-जन्ममें ( प्रत्येक जन्ममें )[ अनेकों प्रकारका ] साधन करते रहते हैं। फिर भी अन्तकालमें उन्हें ‘राम’ नहीं कह आता ( उनके मुखसे रामनाम नहीं निकलता )। जिनके नामके बलसे शङ्करजी काशीमें सबको समानरूपसे अविनाशिनी गति ( मुक्ति ) देते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा॥३॥

भावार्थ: वह श्रीरामजी स्वयं मेरे नेत्रोंके सामने आ गये हैं। हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा ?॥ ३ ॥

**छं०** 
> सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं।  
> जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं॥  
> मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही।  
> अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही॥१॥

भावार्थ: श्रुतियाँ ‘नेति-नेति’ कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करती रहती हैं, तथा प्राण और मनको जीतकर एवं इन्द्रियोंको [ विषयोंके रससे सर्वथा ] नीरस बनाकर मुनिगण ध्यानमें जिनकी कभी क्वचित् ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु ( आप ) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं। आपने मुझे अत्यन्त अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो। परन्तु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्षको काटकर उससे बबूरके बाड़ लगावेगा ( अर्थात् पूर्णकाम बना देनेवाले आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीरकी रक्षा चाहेगा )?॥ १ ॥

**छं०** 
> अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।  
> जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥  
> यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ।  
> गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिऐ॥२॥

भावार्थ: हे नाथ! अब मुझपर दयादृष्टि कीजिये और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिये। मैं कर्मवश जिस योनिमें जन्म लूँ, वहीं श्रीरामजी ( आप ) के चरणोंमें प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बलमें मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिये। और हे देवता और मनुष्योंके नाथ! बाँह पकड़कर इसे अपना दास बनाइये॥२॥

**दो०** 
> राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।  
> सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥१०॥

भावार्थ: श्रीरामजीके चरणोंमें दृढ़ प्रीति करके बालिने शरीरको वैसे ही ( आसानीसे ) त्याग दिया जैसे हाथी अपने गलेसे फूलोंकी मालाका गिरना न जाने॥१०॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/kishkindha-kand/doha-9  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/kishkindha-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/kishkindha-kand/doha-11

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
