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title: "बालकाण्ड दोहा 97"
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# बालकाण्ड · दोहा 97

**चौ०** 
> नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा॥  
> अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा॥१॥

भावार्थ: मैंने नारदका क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और जिन्होंने पार्वतीको ऐसा उपदेश दिया कि जिससे उसने बावले वरके लिये तप किया॥१॥

**चौ०** 
> साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया॥  
> पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा॥२॥

भावार्थ: सचमुच उनके न किसीका मोह है, न माया, न उनके धन है, न घर है और न स्त्री ही है; वे सबसे उदासीन हैं। इसीसे वे दूसरेका घर उजाड़नेवाले हैं। उन्हें न किसीकी लाज है, न डर है। भला, बाँझ स्त्री प्रसवकी पीड़ाको क्या जाने॥२॥

**चौ०** 
> जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी॥  
> अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता॥३॥

भावार्थ: माताको विकल देखकर पार्वतीजी विवेकयुक्त कोमल वाणी बोलीं—हे माता! जो विधाता रच देते हैं, वह टलता नहीं; ऐसा विचारकर तुम सोच मत करो!॥३॥

**चौ०** 
> करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥  
> तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका॥४॥

भावार्थ: जो मेरे भाग्यमें बावला ही पति लिखा है तो किसीको क्यों दोष लगाया जाय? हे माता! क्या विधाताके अङ्क तुमसे मिट सकते हैं? वृथा कलङ्कका टीका मत लो॥४॥

**छं०** 
> जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं।  
> दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥  
> सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं।  
> बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥

भावार्थ: हे माता! कलङ्क मत लो, रोना छोड़ो, यह अवसर विषाद करनेका नहीं है। मेरे भाग्यमें जो दुःख-सुख लिखा है, उसे मैं जहाँ जाऊँगी, वहीं पाऊँगी! पार्वतीजीके ऐसे विनयभरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और भाँति-भाँतिसे विधाताको दोष देकर आँखोंसे आँसू बहाने लगीं।

**दो०** 
> तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत।  
> समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत॥९७॥

भावार्थ: इस समाचारको सुनते ही हिमाचल उसी समय नारदजी और सप्तर्षियोंको साथ लेकर अपने घर गये॥९७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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