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title: "बालकाण्ड दोहा 94"
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# बालकाण्ड · दोहा 94

**चौ०** 
> जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥  
> इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना॥१॥

भावार्थ: जैसा दूल्हा है, अब वैसी ही बरात बन गयी है। मार्गमें चलते हुए भाँति-भाँतिके कौतुक ( तमाशे ) होते जाते हैं। इधर हिमाचलने ऐसा विचित्र मण्डप बनाया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥१॥

**चौ०** 
> सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं॥  
> बन सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा॥२॥

भावार्थ: जगत्‌में जितने छोटे-बड़े पर्वत थे, जिनका वर्णन करके पार नहीं मिलता तथा जितने वन, समुद्र, नदियाँ और तालाब थे, हिमाचलने सबको नेवता भेजा॥२॥

**चौ०** 
> कामरूप सुंदर तन धारी। सहित समाज सहित बर नारी॥  
> गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा॥३॥

भावार्थ: वे सब अपने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुन्दर शरीर धारणकर सुन्दरी स्त्रियों और समाजोंके साथ हिमाचलके घर गये। सभी स्नेहसहित मङ्गलगीत गाते हैं॥३॥

**चौ०** 
> प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए॥  
> पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई॥४॥

भावार्थ: हिमाचलने पहलेहीसे बहुत-से घर सजवा रखे थे। यथायोग्य उन-उन स्थानोंमें सब लोग उतर गये। नगरकी सुन्दर शोभा देखकर ब्रह्माकी रचना-चातुरी भी तुच्छ लगती थी॥४॥

**छं०** 
> लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही।  
> बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही॥  
> मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं।  
> बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं॥

भावार्थ: नगरकी शोभा देखकर ब्रह्माकी निपुणता सचमुच तुच्छ लगती है। वन, बाग, कुएँ, तालाब, नदियाँ सभी सुन्दर हैं; उनका वर्णन कौन कर सकता है? घर-घर बहुत-से मङ्गलसूचक तोरण और ध्वजा-पताकाएँ सुशोभित हो रही हैं। वहाँके सुन्दर और चतुर स्त्री-पुरुषोंकी छबि देखकर मुनियोंके भी मन मोहित हो जाते हैं।

**दो०** 
> जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।  
> रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ॥९४॥

भावार्थ: जिस नगरमें स्वयं जगदम्बाने अवतार लिया, क्या उसका वर्णन हो सकता है? वहाँ ऋद्धि, सिद्धि, सम्पत्ति और सुख नित नये बढ़ते जाते हैं॥९४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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