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title: "बालकाण्ड दोहा 93"
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# बालकाण्ड · दोहा 93

**चौ०** 
> बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई॥  
> बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने॥१॥

भावार्थ: हे भाई! हमलोगोंकी यह बरात वरके योग्य नहीं है। क्या पराये नगरमें जाकर हँसी कराओगे? विष्णुभगवान्‌की बात सुनकर देवता मुसकराये और वे अपनी-अपनी सेनासहित अलग हो गये॥१॥

**चौ०** 
> मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं॥  
> अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे॥२॥

भावार्थ: महादेवजी [ यह देखकर ] मन-ही-मन मुसकराते हैं कि विष्णुभगवान्‌के व्यङ्ग्य-वचन ( दिल्लगी ) नहीं छूटते। अपने प्यारे ( विष्णुभगवान्‌ ) के इन अति प्रिय वचनोंको सुनकर शिवजीने भी भृङ्गीको भेजकर अपने सब गणोंको बुलवा लिया॥२॥

**चौ०** 
> सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए॥  
> नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा॥३॥

भावार्थ: शिवजीकी आज्ञा सुनते ही सब चले आये और उन्होंने स्वामीके चरणकमलोंमें सिर नवाया। तरह-तरहकी सवारियों और तरह-तरहके वेषवाले अपने समाजको देखकर शिवजी हँसे॥३॥

**चौ०** 
> कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥  
> बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥४॥

भावार्थ: कोई बिना मुखका है, किसीके बहुत-से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैरका है तो किसीके कई हाथ-पैर हैं। किसीके बहुत आँखें हैं तो किसीके एक भी आँख नहीं है। कोई बहुत मोटा-ताजा है तो कोई बहुत ही दुबला-पतला है॥४॥

**छं०** 
> तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।  
> भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥  
> खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।  
> बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै॥

भावार्थ: कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र वेष धारण किये हुए है। भयङ्कर गहने पहने हाथमें कपाल लिये हैं और सब-के-सब शरीरमें ताजा खून लपेटे हुए हैं। गधे, कुत्ते, सूअर और सियारके-से उनके मुख हैं। गणोंके अनगिनत वेषोंको कौन गिने? बहुत प्रकारके प्रेत, पिशाच और योगिनियोंकी जमातें हैं। उनका वर्णन करते नहीं बनता।

**सो०** 
> नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।  
> देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि॥९३॥

भावार्थ: भूत-प्रेत नाचते और गाते हैं, वे सब बड़े मौजी हैं। देखनेमें बहुत ही बेढंगे जान पड़ते हैं और बड़े ही विचित्र ढंगसे बोलते हैं॥९३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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