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title: "बालकाण्ड दोहा 89"
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# बालकाण्ड · दोहा 89

**चौ०** 
> यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन॥  
> कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा॥१॥

भावार्थ: हे कामदेवके मदको चूर करनेवाले! आप ऐसा कुछ कीजिये जिससे सब लोग इस उत्सवको नेत्र भरकर देखें। हे कृपाके सागर! कामदेवको भस्म करके आपने रतिको जो वरदान दिया सो बहुत ही अच्छा किया॥१॥

**चौ०** 
> सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ॥  
> पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा॥२॥

भावार्थ: हे नाथ! श्रेष्ठ स्वामियोंका यह सहज स्वभाव ही है कि वे पहले दण्ड देकर फिर कृपा किया करते हैं। पार्वतीने अपार तप किया है, अब उन्हें अङ्गीकार कीजिये॥२॥

**चौ०** 
> सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी॥  
> तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साईं॥३॥

भावार्थ: ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचनोंको याद करके शिवजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘ऐसा ही हो।’ तब देवताओंने नगाड़े बजाये और फूलोंकी वर्षा करके ‘जय हो! देवताओंके स्वामीकी जय हो!’ ऐसा कहने लगे॥३॥

**चौ०** 
> अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए॥  
> प्रथम गए जहँ रहीं भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी॥४॥

भावार्थ: उचित अवसर जानकर सप्तर्षि आये और ब्रह्माजीने तुरंत ही उन्हें हिमाचलके घर भेज दिया। वे पहले वहाँ गये जहाँ पार्वतीजी थीं और उनसे छलसे भरे मीठे (विनोदयुक्त, आनन्द पहुँचानेवाले) वचन बोले— ॥४॥

**दो०** 
> कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस।  
> अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस॥८९॥

भावार्थ: नारदजीके उपदेशसे तुमने उस समय हमारी बात नहीं सुनी। अब तो तुम्हारा प्रण झूठा हो गया, क्योंकि महादेवजीने कामको ही भस्म कर डाला॥८९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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