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title: "बालकाण्ड दोहा 88"
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# बालकाण्ड · दोहा 88

**चौ०** 
> जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा॥  
> कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा॥१॥

भावार्थ: जब पृथ्वीके बड़े भारी भारको उतारनेके लिये यदुवंशमें श्रीकृष्णका अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूपमें उत्पन्न होगा। मेरा यह वचन अन्यथा नहीं होगा॥१॥

**चौ०** 
> रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी॥  
> देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए॥२॥

भावार्थ: शिवजीके वचन सुनकर रति चली गयी। अब दूसरी कथा बखानकर (विस्तारसे) कहता हूँ। ब्रह्मादि देवताओंने ये सब समाचार सुने तो वे वैकुण्ठको चले॥२॥

**चौ०** 
> सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता॥  
> पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा॥३॥

भावार्थ: फिर वहाँसे विष्णु और ब्रह्मासहित सब देवता वहाँ गये जहाँ कृपाके धाम शिवजी थे। उन सबने शिवजीकी अलग-अलग स्तुति की, तब शशिभूषण शिवजी प्रसन्न हो गये॥३॥

**चौ०** 
> बोले कृपासिंधु बृषकेतू। कहहु अमर आए केहि हेतू॥  
> कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी॥४॥

भावार्थ: कृपाके समुद्र शिवजी बोले—हे देवताओ! कहिये, आप किस लिये आये हैं? ब्रह्माजीने कहा—हे प्रभो! आप अन्तर्यामी हैं, तथापि हे स्वामी! भक्तिवश मैं आपसे विनती करता हूँ॥४॥

**दो०** 
> सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु।  
> निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु॥८८॥

भावार्थ: हे शङ्कर! सब देवताओंके मनमें ऐसा परम उत्साह है कि हे नाथ! वे अपनी आँखोंसे आपका विवाह देखना चाहते हैं॥८८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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