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title: "बालकाण्ड दोहा 85"
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# बालकाण्ड · दोहा 85

**चौ०** 
> सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा॥  
> नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाईं। संगम करहिं तलाव तलाईं॥१॥

भावार्थ: सबके हृदयमें कामकी इच्छा हो गयी। लताओं (बेलों) को देखकर वृक्षोंकी डालियाँ झुकने लगीं। नदियाँ उमड़-उमड़कर समुद्रकी ओर दौड़ीं और ताल-तलैयाँ भी आपसमें संगम करने (मिलने-जुलने) लगीं॥१॥

**चौ०** 
> जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी॥  
> पसु पच्छी नभ जल थल चारी। भए कामबस समय बिसारी॥२॥

भावार्थ: जब जड (वृक्ष, नदी आदि) की यह दशा कही गयी, तब चेतन जीवोंकी करनी कौन कह सकता है? आकाश, जल और पृथ्वीपर विचरनेवाले सारे पशु-पक्षी [अपने संयोगका] समय भुलाकर कामके वश हो गये॥२॥

**चौ०** 
> मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका॥  
> देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला॥३॥

भावार्थ: सब लोग कामान्ध होकर व्याकुल हो गये। चकवा-चकवी रात-दिन नहीं देखते। देव, दैत्य, मनुष्य, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत, बेताल— ॥३॥

**चौ०** 
> इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी॥  
> सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी॥४॥

भावार्थ: ये तो सदा ही कामके गुलाम हैं, यह समझकर मैंने इनकी दशाका वर्णन नहीं किया। सिद्ध, विरक्त, महामुनि और महान्‌ योगी भी कामके वश होकर योगरहित या स्त्रीके विरही हो गये॥४॥

**छं०** 
> भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै।  
> देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे॥  
> अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं।  
> दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं॥

भावार्थ: जब योगीश्वर और तपस्वी भी कामके वश हो गये, तब पामर मनुष्योंकी कौन कहे? जो समस्त चराचर जगत्‌को ब्रह्ममय देखते थे, वे अब उसे स्त्रीमय देखने लगे। स्त्रियाँ सारे संसारको पुरुषमय देखने लगीं और पुरुष उसे स्त्रीमय देखने लगे। दो घड़ीतक सारे ब्रह्माण्डके अंदर कामदेवका रचा हुआ यह कौतुक (तमाशा) रहा।

**सो०** 
> धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे।  
> जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ॥८५॥

भावार्थ: किसीने भी हृदयमें धैर्य नहीं धारण किया, कामदेवने सबके मन हर लिये। श्रीरघुनाथजीने जिनकी रक्षा की, केवल वे ही उस समय बचे रहे॥८५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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