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title: "बालकाण्ड दोहा 83"
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# बालकाण्ड · दोहा 83

**चौ०** 
> मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई॥  
> सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥१॥

भावार्थ: मेरी बात सुनकर उपाय करो। ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जायगा। सतीजीने जो दक्षके यज्ञमें देहका त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचलके घर जाकर जन्म लिया है॥१॥

**चौ०** 
> तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥  
> जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी॥२॥

भावार्थ: उन्होंने शिवजीको पति बनानेके लिये तप किया है, इधर शिवजी सब छोड़-छाड़कर समाधि लगा बैठे हैं। यद्यपि है तो बड़े असमंजसकी बात; तथापि मेरी एक बात सुनो॥२॥

**चौ०** 
> पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥  
> तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई॥३॥

भावार्थ: तुम जाकर कामदेवको शिवजीके पास भेजो, वह शिवजीके मनमें क्षोभ उत्पन्न करे (उनकी समाधि भङ्ग करे)। तब हम जाकर शिवजीके चरणोंमें सिर रख देंगे और जबरदस्ती (उन्हें राजी करके) विवाह करा देंगे॥३॥

**चौ०** 
> एहि बिधि भलेहिं देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई॥  
> अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥४॥

भावार्थ: इस प्रकारसे भले ही देवताओंका हित हो [और तो कोई उपाय नहीं है] सबने कहा—यह सम्मति बहुत अच्छी है। फिर देवताओंने बड़े प्रेमसे स्तुति की, तब विषम (पाँच) बाण धारण करनेवाला और मछलीके चिह्नयुक्त ध्वजावाला कामदेव प्रकट हुआ॥४॥

**दो०** 
> सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।  
> संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार॥८३॥

भावार्थ: देवताओंने कामदेवसे अपनी सारी विपत्ति कही। सुनकर कामदेवने मनमें विचार किया और हँसकर देवताओंसे यों कहा कि शिवजीके साथ विरोध करनेमें मेरी कुशल नहीं है॥८३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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