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title: "बालकाण्ड दोहा 81"
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# बालकाण्ड · दोहा 81

**चौ०** 
> जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥  
> अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा॥१॥

भावार्थ: हे मुनीश्वरो! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर-माथे रखकर सुनती। परंतु अब तो मैं अपना जन्म शिवजीके लिये हार चुकी। फिर गुण-दोषोंका विचार कौन करे?॥१॥

**चौ०** 
> जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी॥  
> तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं॥२॥

भावार्थ: यदि आपके हृदयमें बहुत ही हठ है और विवाहकी बातचीत ( बरेखी ) किये बिना आपसे रहा ही नहीं जाता, तो संसारमें वर-कन्या बहुत हैं। खिलवाड़ करनेवालोंको आलस्य तो होता नहीं [ और कहीं जाकर कीजिये ]॥२॥

**चौ०** 
> जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥  
> तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥३॥

भावार्थ: मेरा तो करोड़ जन्मोंतक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजीको वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजीके उपदेशको न छोड़ूँगी॥३॥

**चौ०** 
> मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा॥  
> देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी॥४॥

भावार्थ: जगज्जननी पार्वतीजीने फिर कहा कि मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। आप अपने घर जाइये, बहुत देर हो गयी। [ शिवजीमें पार्वतीजीका ऐसा ] प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले—हे जगज्जननी! हे भवानी! आपकी जय हो! जय हो!!॥४॥

**दो०** 
> तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।  
> नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥८१॥

भावार्थ: आप माया हैं और शिवजी भगवान्‌ हैं। आप दोनों समस्त जगत्‌के माता-पिता हैं। [ यह कहकर ] मुनि पार्वतीजीके चरणोंमें सिर नवाकर चल दिये। उनके शरीर बार-बार पुलकित हो रहे थे॥८१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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