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title: "बालकाण्ड दोहा 80"
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# बालकाण्ड · दोहा 80

**चौ०** 
> अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा॥  
> अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला॥१॥

भावार्थ: अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिये अच्छा वर विचारा है। वह बहुत ही सुन्दर, पवित्र, सुखदायक और सुशील है, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं॥१॥

**चौ०** 
> दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥  
> अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी॥२॥

भावार्थ: वह दोषोंसे रहित, सारे सद्‌गुणोंकी राशि, लक्ष्मीका स्वामी और वैकुण्ठपुरीका रहनेवाला है। हम ऐसे वरको लाकर तुमसे मिला देंगे। यह सुनते ही पार्वतीजी हँसकर बोलीं— ॥२॥

**चौ०** 
> सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा॥  
> कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई॥३॥

भावार्थ: आपने यह सत्य ही कहा कि मेरा यह शरीर पर्वतसे उत्पन्न हुआ है। इसलिये हठ नहीं छूटेगा, शरीर भले ही छूट जाय। सोना भी पत्थरसे ही उत्पन्न होता है, सो वह जलाये जानेपर भी अपने स्वभाव ( सुवर्णत्व )-को नहीं छोड़ता॥३॥

**चौ०** 
> नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ॥  
> गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥४॥

भावार्थ: अतः मैं नारदजीके वचनोंको नहीं छोड़ूँगी; चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। जिसको गुरुके वचनोंमें विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्नमें भी सुगम नहीं होती॥४॥

**दो०** 
> महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।  
> जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥८०॥

भावार्थ: माना कि महादेवजी अवगुणोंके भवन हैं और विष्णु समस्त सद्गुणोंके धाम हैं; पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसीसे काम है॥८०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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