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title: "बालकाण्ड दोहा 78"
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# बालकाण्ड · दोहा 78

**चौ०** 
> रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी॥  
> बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥१॥

भावार्थ: ऋषियोंने [ वहाँ जाकर ] पार्वतीको कैसी देखा, मानो मूर्तिमान्‌ तपस्या ही हो। मुनि बोले—हे शैलकुमारी! सुनो, तुम किसलिये इतना कठोर तप कर रही हो?॥१॥

**चौ०** 
> केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू॥  
> कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई॥२॥

भावार्थ: तुम किसकी आराधना करती हो और क्या चाहती हो? हमसे अपना सच्चा भेद क्यों नहीं कहतीं? [ पार्वतीने कहा— ] बात कहते मन बहुत सकुचाता है। आपलोग मेरी मूर्खता सुनकर हँसेंगे॥२॥

**चौ०** 
> मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा॥  
> नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना॥३॥

भावार्थ: मनने हठ पकड़ लिया है, वह उपदेश नहीं सुनता और जलपर दीवाल उठाना चाहता है। नारदजीने जो कह दिया उसे सत्य जानकर मैं बिना ही पाँखके उड़ना चाहती हूँ॥३॥

**चौ०** 
> देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा॥४॥

भावार्थ: हे मुनियो! आप मेरा अज्ञान तो देखिये कि मैं सदा शिवजीको ही पति बनाना चाहती हूँ॥४॥

**दो०** 
> सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह।  
> नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह॥७८॥

भावार्थ: पार्वतीजीकी बात सुनते ही ऋषिलोग हँस पड़े और बोले—तुम्हारा शरीर पर्वतसे ही तो उत्पन्न हुआ है! भला, कहो तो नारदका उपदेश सुनकर आजतक किसका घर बसा है?॥७८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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