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title: "बालकाण्ड दोहा 77"
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# बालकाण्ड · दोहा 77

**चौ०** 
> कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं॥  
> सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा॥१॥

भावार्थ: शिवजीने कहा—यद्यपि ऐसा उचित नहीं है, परन्तु स्वामीकी बात भी मेटी नहीं जा सकती। हे नाथ! मेरा यही परम धर्म है कि मैं आपकी आज्ञाको सिरपर रखकर उसका पालन करूँ॥१॥

**चौ०** 
> मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥  
> तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी॥२॥

भावार्थ: माता, पिता, गुरु और स्वामीकी बातको बिना ही विचारे शुभ समझकर करना ( मानना ) चाहिये। फिर आप तो सब प्रकारसे मेरे परम हितकारी हैं। हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिरपर है॥२॥

**चौ०** 
> प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना॥  
> कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ॥३॥

भावार्थ: शिवजीकी भक्ति, ज्ञान और धर्मसे युक्त वचनरचना सुनकर प्रभु रामचन्द्रजी सन्तुष्ट हो गये। प्रभुने कहा—हे हर! आपकी प्रतिज्ञा पूरी हो गयी। अब हमने जो कहा है उसे हृदयमें रखना॥३॥

**चौ०** 
> अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी॥  
> तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए॥४॥

भावार्थ: इस प्रकार कहकर श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्धान हो गये। शिवजीने उनकी वह मूर्ति अपने हृदयमें रख ली। उसी समय सप्तर्षि शिवजीके पास आये। प्रभु महादेवजीने उनसे अत्यन्त सुहावने वचन कहे– ॥४॥

**दो०** 
> पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।  
> गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु॥७७॥

भावार्थ: आपलोग पार्वतीके पास जाकर उनके प्रेमकी परीक्षा लीजिये और हिमाचलको कहकर [ उन्हें पार्वतीको लिवा लानेके लिये भेजिये तथा ] पार्वतीको घर भिजवाइये और उनके सन्देहको दूर कीजिये॥७७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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