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title: "बालकाण्ड दोहा 76"
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# बालकाण्ड · दोहा 76

श्रीरामजीका शिवजीसे विवाहके लिये अनुरोध · सप्तर्षियोंकी परीक्षामें पार्वतीजीका महत्त्व

**चौ०** 
> कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥  
> जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना॥१॥

भावार्थ: वे कहीं मुनियोंको ज्ञानका उपदेश करते और कहीं श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करते थे। यद्यपि सुजान शिवजी निष्काम हैं, तो भी वे भगवान्‌ अपने भक्त ( सती ) के वियोगके दुःखसे दुःखी हैं॥१॥

**चौ०** 
> एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती॥  
> नेमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा॥२॥

भावार्थ: इस प्रकार बहुत समय बीत गया। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें नित नयी प्रीति हो रही है। शिवजीके [ कठोर ] नियम, [ अनन्य ] प्रेम और उनके हृदयमें भक्तिकी अटल टेकको [ जब श्रीरामचन्द्रजीने ] देखा,॥२॥

**चौ०** 
> प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला॥  
> बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा॥३॥

भावार्थ: तब कृतज्ञ ( उपकार माननेवाले ), कृपालु, रूप और शीलके भण्डार, महान्‌ तेजपुञ्ज भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी प्रकट हुए। उन्होंने बहुत तरहसे शिवजीकी सराहना की और कहा कि आपके बिना ऐसा ( कठिन ) व्रत कौन निबाह सकता है॥३॥

**चौ०** 
> बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा॥  
> अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी॥४॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीने बहुत प्रकारसे शिवजीको समझाया और पार्वतीजीका जन्म सुनाया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने विस्तारपूर्वक पार्वतीजीकी अत्यन्त पवित्र करनीका वर्णन किया॥४॥

**दो०** 
> अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु।  
> जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु॥७६॥

भावार्थ: [ फिर उन्होंने शिवजीसे कहा— ] हे शिवजी! यदि मुझपर आपका स्नेह है तो अब आप मेरी विनती सुनिये। मुझे यह माँगे दीजिये कि आप जाकर पार्वतीके साथ विवाह कर लें॥७६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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