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title: "बालकाण्ड दोहा 73"
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# बालकाण्ड · दोहा 73

**चौ०** 
> करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी॥  
> मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा॥१॥

भावार्थ: हे पार्वती! नारदजीने जो कहा है, उसे सत्य समझकर तू जाकर तप कर। फिर यह बात तेरे माता-पिताको भी अच्छी लगी है। तप सुख देनेवाला और दुःख-दोषका नाश करनेवाला है॥ १ ॥

**चौ०** 
> तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥  
> तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥२॥

भावार्थ: तपके बलसे ही ब्रह्मा संसारको रचते हैं और तपके बलसे ही विष्णु सारे जगत्‌का पालन करते हैं। तपके बलसे ही शम्भु [ रुद्ररूपसे जगत्‌का ] संहार करते हैं और तपके बलसे ही शेषजी पृथ्वीका भार धारण करते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी॥  
> सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी॥३॥

भावार्थ: हे भवानी! सारी सृष्टि तपके ही आधारपर है। ऐसा जीमें जानकर तू जाकर तप कर। यह बात सुनकर माताको बड़ा अचरज हुआ और उसने हिमवान्‌को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> मातु पितहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई॥  
> प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता॥४॥

भावार्थ: माता-पिताको बहुत तरहसे समझाकर बड़े हर्षके साथ पार्वतीजी तप करनेके लिये चलीं। प्यारे कुटुम्बी, पिता और माता सब व्याकुल हो गये। किसीके मुँहसे बात नहीं निकलती॥४॥

**दो०** 
> बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।  
> पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ॥७३॥

भावार्थ: तब वेदशिरा मुनिने आकर सबको समझाकर कहा। पार्वतीजीकी महिमा सुनकर सबको समाधान हो गया॥७३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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