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title: "बालकाण्ड दोहा 70"
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# बालकाण्ड · दोहा 70

**चौ०** 
> सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥  
> सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥१॥

भावार्थ: गङ्गाजलसे भी बनायी हुई मदिराको जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते। पर वही गङ्गाजीमें मिल जानेपर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीवमें भी वैसा ही भेद है॥ १ ॥

**चौ०** 
> संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥  
> दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू॥२॥

भावार्थ: शिवजी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान्‌ हैं। इसलिये इस विवाहमें सब प्रकार कल्याण है। परन्तु महादेवजीकी आराधना बड़ी कठिन है, फिर भी क्लेश ( तप ) करनेसे वे बहुत जल्द सन्तुष्ट हो जाते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥  
> जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥३॥

भावार्थ: यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेवजी होनहारको मिटा सकते हैं। यद्यपि संसारमें वर अनेक हैं, पर इसके लिये शिवजीको छोड़कर दूसरा वर नहीं है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥  
> इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥४॥

भावार्थ: शिवजी वर देनेवाले, शरणागतोंके दुःखोंका नाश करनेवाले, कृपाके समुद्र और सेवकोंके मनको प्रसन्न करनेवाले हैं। शिवजीकी आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप करनेपर भी वाञ्छित फल नहीं मिलता॥ ४ ॥

**दो०** 
> अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।  
> होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस॥७०॥

भावार्थ: ऐसा कहकर भगवान्‌का स्मरण करके नारदजीने पार्वतीको आशीर्वाद दिया। [ और कहा कि— ] हे पर्वतराज! तुम सन्देहका त्याग कर दो, अब यह कल्याण ही होगा॥ ७० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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