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title: "बालकाण्ड दोहा 69"
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# बालकाण्ड · दोहा 69

**चौ०** 
> तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥  
> जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं॥१॥

भावार्थ: तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ। यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है। उमाको वर तो निःसन्देह वैसा ही मिलेगा जैसा मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है॥ १ ॥

**चौ०** 
> जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने॥  
> जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई॥२॥

भावार्थ: परन्तु मैंने वरके जो-जो दोष बतलाये हैं, मेरे अनुमानसे वे सभी शिवजीमें हैं। यदि शिवजीके साथ विवाह हो जाय तो दोषोंको भी सब लोग गुणोंके समान ही कहेंगे॥ २ ॥

**चौ०** 
> जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥  
> भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥३॥

भावार्थ: जैसे विष्णुभगवान्‌ शेषनागकी शय्यापर सोते हैं, तो भी पण्डित लोग उनको कोई दोष नहीं लगाते। सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसोंका भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥  
> समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥४॥

भावार्थ: गङ्गाजीमें शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता। सूर्य, अग्नि और गङ्गाजीकी भाँति समर्थको कुछ दोष नहीं लगता॥ ४ ॥

**दो०** 
> जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।  
> परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान॥६९॥

भावार्थ: यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञानके अभिमानसे इस प्रकार होड़ करते हैं तो वे कल्पभरके लिये नरकमें पड़ते हैं। भला, कहीं जीव भी ईश्वरके समान ( सर्वथा स्वतन्त्र ) हो सकता है?॥ ६९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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