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title: "बालकाण्ड दोहा 66"
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# बालकाण्ड · दोहा 66

**चौ०** 
> सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं॥  
> सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥१॥

भावार्थ: सारी नदियोंमें पवित्र जल बहता है और पक्षी, पशु, भ्रमर सभी सुखी रहते हैं। सब जीवोंने अपना स्वाभाविक वैर छोड़ दिया और पर्वतपर सभी परस्पर प्रेम करते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ॥  
> नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥२॥

भावार्थ: पार्वतीजीके घर आ जानेसे पर्वत ऐसा शोभायमान हो रहा है जैसा रामभक्तिको पाकर भक्त शोभायमान होता है। उस ( पर्वतराज ) के घर नित्य नये-नये मङ्गलोत्सव होते हैं, जिसका ब्रह्मादि यश गाते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए॥  
> सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा॥३॥

भावार्थ: जब नारदजीने ये सब समाचार सुने तो वे कौतुकहीसे हिमाचलके घर पधारे। पर्वतराजने उनका बड़ा आदर किया और चरण धोकर उनको उत्तम आसन दिया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥  
> निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥४॥

भावार्थ: फिर अपनी स्त्रीसहित मुनिके चरणोंमें सिर नवाया और उनके चरणोदकको सारे घरमें छिड़काया। हिमाचलने अपने सौभाग्यका बहुत बखान किया और पुत्रीको बुलाकर मुनिके चरणोंपर डाल दिया॥ ४ ॥

**दो०** 
> त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।  
> कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥६६॥

भावार्थ: [ और कहा— ] हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी सर्वत्र पहुँच है। अतः आप हृदयमें विचारकर कन्याके दोष-गुण कहिये॥ ६६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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