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title: "बालकाण्ड दोहा 64"
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# बालकाण्ड · दोहा 64

पतिके अपमानसे दुःखी होकर सतीका योगाग्निसे जल जाना, दक्ष-यज्ञ-विध्वंस · पार्वतीका जन्म और तपस्या

**चौ०** 
> सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा॥  
> सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥१॥

भावार्थ: हे सभासदो और सब मुनीश्वरो! सुनो। जिन लोगोंने यहाँ शिवजीकी निन्दा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भलीभाँति पछतायँगे॥१॥

**चौ०** 
> संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा॥  
> काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥२॥

भावार्थ: जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति विष्णुभगवान्‌की निन्दा सुनी जाय वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस ( निन्दा करनेवाले ) की जीभ काट ले और नहीं तो कान मूँदकर वहाँसे भाग जाय॥२॥

**चौ०** 
> जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी॥  
> पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥३॥

भावार्थ: त्रिपुर दैत्यको मारनेवाले भगवान्‌ महेश्वर सम्पूर्ण जगत्‌के आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सबका हित करनेवाले हैं। मेरा मन्दबुद्धि पिता उनकी निन्दा करता है; और मेरा यह शरीर दक्षहीके वीर्यसे उत्पन्न है॥३॥

**चौ०** 
> तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू॥  
> अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥४॥

भावार्थ: इसलिये चन्द्रमाको ललाटपर धारण करनेवाले वृषकेतु शिवजीको हृदयमें धारण करके मैं इस शरीरको तुरंत ही त्याग दूँगी। ऐसा कहकर सतीजीने योगाग्निमें अपना शरीर भस्म कर डाला। सारी यज्ञशालामें हाहाकार मच गया॥ ४ ॥

**दो०** 
> सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।  
> जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस॥६४॥

भावार्थ: सतीका मरण सुनकर शिवजीके गण यज्ञ विध्वंस करने लगे। यज्ञ विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगुजीने उसकी रक्षा की॥ ६४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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