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title: "बालकाण्ड दोहा 58"
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# बालकाण्ड · दोहा 58

**चौ०** 
> हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी॥  
> कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥१॥

भावार्थ: अपनी करनीको याद करके सतीजीके हृदयमें इतना सोच है और इतनी अपार चिन्ता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। [ उन्होंने समझ लिया कि ] शिवजी कृपाके परम अथाह सागर हैं, इससे प्रकटमें उन्होंने मेरा अपराध नहीं कहा॥१॥

**चौ०** 
> संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी॥  
> निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥२॥

भावार्थ: शिवजीका रुख देखकर सतीजीने जान लिया कि स्वामीने मेरा त्याग कर दिया और वे हृदयमें व्याकुल हो उठीं। अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता, परन्तु हृदय [ भीतर-ही-भीतर ] कुम्हारके आँवेके समान अत्यन्त जलने लगा॥२॥

**चौ०** 
> सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुखहेतू॥  
> बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥३॥

भावार्थ: वृषकेतु शिवजीने सतीको चिन्तायुक्त जानकर उन्हें सुख देनेके लिये सुन्दर कथाएँ कहीं। इस प्रकार मार्गमें विविध प्रकारके इतिहासोंको कहते हुए विश्वनाथ कैलास जा पहुँचे॥३॥

**चौ०** 
> तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बटतर करि कमलासन॥  
> संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥४॥

भावार्थ: वहाँ फिर शिवजी अपनी प्रतिज्ञाको याद करके बड़के पेड़के नीचे पद्मासन लगाकर बैठ गये। शिवजीने अपना स्वाभाविक रूप सँभाला। उनकी अखण्ड और अपार समाधि लग गयी॥४॥

**दो०** 
> सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।  
> मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥५८॥

भावार्थ: तब सतीजी कैलासपर रहने लगीं। उनके मनमें बड़ा दुःख था। इस रहस्यको कोई कुछ भी नहीं जानता था। उनका एक-एक दिन युगके समान बीत रहा था॥५८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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