---
title: "बालकाण्ड दोहा 50"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-50"
lang: "hi"
---

# बालकाण्ड · दोहा 50

सतीका भ्रम, श्रीरामजीका ऐश्वर्य और सतीका खेद

**चौ०** 
> संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा॥  
> भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारी॥१॥

भावार्थ: श्रीशिवजीने उसी अवसरपर श्रीरामजीको देखा और उनके हृदयमें बहुत भारी आनन्द उत्पन्न हुआ। उन शोभाके समुद्र ( श्रीरामचन्द्रजी ) को शिवजीने नेत्र भरकर देखा, परन्तु अवसर ठीक न जानकर परिचय नहीं किया॥१॥

**चौ०** 
> जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन॥  
> चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता॥२॥

भावार्थ: जगत्‌के पवित्र करनेवाले सच्चिदानन्दकी जय हो, इस प्रकार कहकर कामदेवका नाश करनेवाले श्रीशिवजी चल पड़े। कृपानिधान शिवजी बार-बार आनन्दसे पुलकित होते हुए सतीजीके साथ चले जा रहे थे॥२॥

**चौ०** 
> सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी॥  
> संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥३॥

भावार्थ: सतीजीने शङ्करजीकी वह दशा देखी तो उनके मनमें बड़ा सन्देह उत्पन्न हो गया। [ वे मन-ही-मन कहने लगीं कि ] शङ्करजीकी सारा जगत्‌ वन्दना करता है, वे जगत्‌के ईश्वर हैं; देवता, मनुष्य, मुनि सब उनके प्रति सिर नवाते हैं॥३॥

**चौ०** 
> तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधामा॥  
> भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥४॥

भावार्थ: उन्होंने एक राजपुत्रको सच्चिदानन्द परमधाम कहकर प्रणाम किया और उसकी शोभा देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गये कि अबतक उनके हृदयमें प्रीति रोकनेसे भी नहीं रुकती॥४॥

**दो०** 
> ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।  
> सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद॥५०॥

भावार्थ: जो ब्रह्म सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित और भेदरहित है, और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है?॥५०॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-49  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-51

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
