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title: "बालकाण्ड दोहा 48b"
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# बालकाण्ड · दोहा 48b

**चौ०** 
> एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥  
> संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥१॥

भावार्थ: एक बार त्रेतायुगमें शिवजी अगस्त्य ऋषिके पास गये। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषिने सम्पूर्ण जगत्‌के ईश्वर जानकर उनका पूजन किया॥ १ ॥

**चौ०** 
> रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी॥  
> रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई॥२॥

भावार्थ: मुनिवर अगस्त्यजीने रामकथा विस्तारसे कही, जिसको महेश्वरने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषिने शिवजीसे सुन्दर हरिभक्ति पूछी और शिवजीने उनको अधिकारी पाकर [ रहस्यसहित ] भक्तिका निरूपण किया॥ २ ॥

**चौ०** 
> कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥  
> मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥३॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कथाएँ कहते-सुनते कुछ दिनोंतक शिवजी वहाँ रहे। फिर मुनिसे विदा माँगकर शिवजी दक्षकुमारी सतीजीके साथ घर ( कैलास ) को चले॥३॥

**चौ०** 
> तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा॥  
> पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी॥४॥

भावार्थ: उन्हीं दिनों पृथ्वीका भार उतारनेके लिये श्रीहरिने रघुवंशमें अवतार लिया था। वे अविनाशी भगवान्‌ उस समय पिताके वचनसे राज्यका त्याग करके तपस्वी या साधुवेशमें दण्डकवनमें विचर रहे थे॥४॥

**दो०** 
> हृदयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।  
> गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ॥४८ (क)॥

भावार्थ: शिवजी हृदयमें विचारते जा रहे थे कि भगवान्‌के दर्शन मुझे किस प्रकार हों। प्रभुने गुप्तरूपसे अवतार लिया है, मेरे जानेसे सब लोग जान जायँगे॥४८ ( क )॥

**सो०** 
> संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।  
> तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची॥४८ (ख)॥

भावार्थ: श्रीशङ्करजीके हृदयमें इस बातको लेकर बड़ी खलबली उत्पन्न हो गयी, परन्तु सतीजी इस भेदको नहीं जानती थीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि शिवजीके मनमें [ भेद खुलनेका ] डर था, परन्तु दर्शनके लोभसे उनके नेत्र ललचा रहे थे॥४८ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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