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title: "बालकाण्ड दोहा 45"
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# बालकाण्ड · दोहा 45

**चौ०** 
> एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥  
> प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥१॥

भावार्थ: इसी प्रकार माघके महीनेभर स्नान करते हैं और फिर सब अपने-अपने आश्रमोंको चले जाते हैं। हर साल वहाँ इसी तरह बड़ा आनन्द होता है। मकरमें स्नान करके मुनिगण चले जाते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥  
> जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥२॥

भावार्थ: एक बार पूरे मकरभर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने-अपने आश्रमोंको लौट गये। परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनिको चरण पकड़कर भरद्वाजजीने रख लिया॥ २ ॥

**चौ०** 
> सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे॥  
> करि पूजा मुनि सुजसु बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी॥३॥

भावार्थ: आदरपूर्वक उनके चरणकमल धोये और बड़े ही पवित्र आसनपर उन्हें बैठाया। पूजा करके मुनि याज्ञवल्क्यजीके सुयशका वर्णन किया और फिर अत्यन्त पवित्र और कोमल वाणीसे बोले— ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥  
> कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥४॥

भावार्थ: हे नाथ! मेरे मनमें एक बड़ा सन्देह है; वेदोंका तत्त्व सब आपकी मुट्ठीमें है ( अर्थात्‌ आप ही वेदका तत्त्व जाननेवाले होनेके कारण मेरा सन्देह निवारण कर सकते हैं ) पर उस सन्देहको कहते मुझे भय और लाज आती है [ भय इसलिये कि कहीं आप यह न समझें कि मेरी परीक्षा ले रहा है, लाज इसलिये कि इतनी आयु बीत गयी, अबतक ज्ञान न हुआ ] और यदि नहीं कहता तो बड़ी हानि होती है [ क्योंकि अज्ञानी बना रहता हूँ ]॥ ४ ॥

**दो०** 
> संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।  
> होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥४५॥

भावार्थ: हे प्रभो! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरुके साथ छिपाव करनेसे हृदयमें निर्मल ज्ञान नहीं होता॥ ४५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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