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title: "बालकाण्ड दोहा 44"
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# बालकाण्ड · दोहा 44

याज्ञवल्क्य-भरद्वाज-संवाद तथा प्रयाग-माहात्म्य

**चौ०** 
> भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥  
> तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥१॥

भावार्थ: भरद्वाजमुनि प्रयागमें बसते हैं, उनका श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीतचित्त, जितेन्द्रिय, दयाके निधान और परमार्थके मार्गमें बड़े ही चतुर हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥  
> देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥२॥

भावार्थ: माघमें जब सूर्य मकर राशिपर जाते हैं तब सब लोग तीर्थराज प्रयागको आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्योंके समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणीमें स्नान करते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> पूजहिं माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥  
> भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन॥३॥

भावार्थ: श्रीवेणीमाधवजीके चरणकमलोंको पूजते हैं और अक्षयवटका स्पर्शकर उनके शरीर पुलकित होते हैं। भरद्वाजजीका आश्रम बहुत ही पवित्र, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियोंके मनको भानेवाला है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥  
> मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥४॥

भावार्थ: तीर्थराज प्रयागमें जो स्नान करने जाते हैं उन ऋषि-मुनियोंका समाज वहाँ ( भरद्वाजके आश्रममें ) जुटता है। प्रातःकाल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान्‌के गुणोंकी कथाएँ कहते हैं॥ ४ ॥

**दो०** 
> ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।  
> कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥४४॥

भावार्थ: ब्रह्मका निरूपण, धर्मका विधान और तत्त्वोंके विभागका वर्णन करते हैं तथा ज्ञान-वैराग्यसे युक्त भगवान्‌की भक्तिका कथन करते हैं॥ ४४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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