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title: "बालकाण्ड दोहा 43b"
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# बालकाण्ड · दोहा 43b

**चौ०** 
> आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥  
> अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥१॥

भावार्थ: मेरा आर्तभाव, विनय और दीनता इस सुन्दर और निर्मल जलका कम हलकापन नहीं है ( अर्थात् अत्यन्त हलकापन है)। यह जल बड़ा ही अनोखा है, जो सुननेसे ही गुण करता है और आशारूपी प्यासको और मनके मैलको दूर कर देता है॥ १॥

**चौ०** 
> राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी॥  
> भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥२॥

भावार्थ: यह जल श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर प्रेमको पुष्ट करता है, कलियुगके समस्त पापों और उनसे होनेवाली ग्लानिको हर लेता है। संसारके ( जन्म-मृत्युरूप ) श्रमको सोख लेता है, सन्तोषको भी सन्तुष्ट करता है और पाप, ताप, दरिद्रता और दोषोंको नष्ट कर देता है॥ २॥

**चौ०** 
> काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन॥  
> सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥३॥

भावार्थ: यह जल काम, क्रोध, मद और मोहका नाश करनेवाला और निर्मल ज्ञान और वैराग्यका बढ़ानेवाला है। इसमें आदरपूर्वक स्नान करनेसे और इसे पीनेसे हृदयमें रहनेवाले सब पाप-ताप मिट जाते हैं॥ ३॥

**चौ०** 
> जिन्ह एहिं बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥  
> तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहिं मृग जिमि जीव दुखारी॥४॥

भावार्थ: जिन्होंने इस ( राम-सुयशरूपी ) जलसे अपने हृदयको नहीं धोया, वे कायर कलिकालके द्वारा ठगे गये। जैसे प्यासा हिरन सूर्यकी किरणोंके रेतपर पड़नेसे उत्पन्न हुए जलके भ्रमको वास्तविक जल समझकर पीनेको दौड़ता है और जल न पाकर दुखी होता है, वैसे ही वे ( कलियुगसे ठगे हुए ) जीव भी [ विषयोंके पीछे भटककर ] दुःखी होंगे॥ ४॥

**दो०** 
> मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ।  
> सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ॥४३ (क)॥

भावार्थ: अपनी बुद्धिके अनुसार इस सुन्दर जलके गुणोंको विचारकर, उसमें अपने मनको स्नान कराकर और श्रीभवानी-शङ्करको स्मरण करके कवि ( तुलसीदास ) सुन्दर कथा कहता है॥ ४३ ( क )॥

**दो०** 
> अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद।  
> कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद॥४३ (ख)॥

भावार्थ: मैं अब श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारणकर और उनका प्रसाद पाकर दोनों श्रेष्ठ मुनियोंके मिलनका सुन्दर संवाद वर्णन करता हूँ॥ ४३ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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