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title: "बालकाण्ड दोहा 42"
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# बालकाण्ड · दोहा 42

**चौ०** 
> कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी॥  
> हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू॥१॥

भावार्थ: यह कीर्तिरूपिणी नदी छहों ऋतुओंमें सुन्दर है। सभी समय यह परम सुहावनी और अत्यन्त पवित्र है। इसमें शिव-पार्वतीका विवाह हेमन्त-ऋतु है। श्रीरामचन्द्रजीके जन्मका उत्सव सुखदायी शिशिर-ऋतु है॥१॥

**चौ०** 
> बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू॥  
> ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू॥२॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके विवाह-समाजका वर्णन ही आनन्द-मङ्गलमय ऋतुराज वसंत है। श्रीरामजीका वनगमन दुःसह ग्रीष्म-ऋतु है और मार्गकी कथा ही कड़ी धूप और लू है॥ २॥

**चौ०** 
> बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी॥  
> राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई॥३॥

भावार्थ: राक्षसोंके साथ घोर युद्ध ही वर्षा-ऋतु है, जो देवकुलरूपी धानके लिये सुन्दर कल्याण करनेवाली है। रामचन्द्रजीके राज्यकालका जो सुख, विनम्रता और बड़ाई है वही निर्मल सुख देनेवाली सुहावनी शरद्-ऋतु है॥ ३॥

**चौ०** 
> सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा॥  
> भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई॥४॥

भावार्थ: सती-शिरोमणि श्रीसीताजीके गुणोंकी जो कथा है, वही इस जलका निर्मल और अनुपम गुण है। श्रीभरतजीका स्वभाव इस नदीकी सुन्दर शीतलता है, जो सदा एक-सी रहती है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ४॥

**दो०** 
> अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास।  
> भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास॥४२॥

भावार्थ: चारों भाइयोंका परस्पर देखना, बोलना, मिलना, एक-दूसरेसे प्रेम करना, हँसना और सुन्दर भाईपना इस जलकी मधुरता और सुगन्ध हैं॥ ४२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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