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title: "बालकाण्ड दोहा 38"
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# बालकाण्ड · दोहा 38

**चौ०** 
> जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे॥  
> सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी॥१॥

भावार्थ: जो लोग इस चरित्रको सावधानीसे गाते हैं, वे ही इस तालाबके चतुर रखवाले हैं और जो स्त्री-पुरुष सदा आदरपूर्वक इसे सुनते हैं, वे ही इस सुन्दर मानसके अधिकारी उत्तम देवता हैं॥ १॥

**चौ०** 
> अति खल जे बिषई बग कागा। एहि सर निकट न जाहिं अभागा॥  
> संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना॥२॥

भावार्थ: जो अति दुष्ट और विषयी हैं वे अभागे बगुले और कौवे हैं, जो इस सरोवरके समीप नहीं जाते। क्योंकि यहाँ ( इस मानस-सरोवरमें ) घोंघे, मेढक और सेवारके समान विषय-रसकी नाना कथाएँ नहीं हैं॥ २॥

**चौ०** 
> तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे॥  
> आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई॥३॥

भावार्थ: इसी कारण बेचारे कौवे और बगुलेरूपी विषयी लोग यहाँ आते हुए हृदयमें हार मान जाते हैं। क्योंकि इस सरोवरतक आनेमें कठिनाइयाँ बहुत हैं। श्रीरामजीकी कृपा बिना यहाँ नहीं आया जाता॥ ३॥

**चौ०** 
> कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला॥  
> गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला॥४॥

भावार्थ: घोर कुसंग ही भयानक बुरा रास्ता है; उन कुसंगियोंके वचन ही बाघ, सिंह और साँप हैं। घरके काम-काज और गृहस्थीके भाँति-भाँतिके जंजाल ही अत्यन्त दुर्गम बड़े-बड़े पहाड़ हैं॥ ४॥

**चौ०** 
> बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना॥५॥

भावार्थ: मोह, मद और मान ही बहुत-से बीहड़ वन हैं और नाना प्रकारके कुतर्क ही भयानक नदियाँ हैं॥ ५॥

**दो०** 
> जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ।  
> तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥३८॥

भावार्थ: जिनके पास श्रद्धारूपी राह-खर्च नहीं है और संतोंका साथ नहीं है और जिनको श्रीरघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिये यह मानस अत्यन्त ही अगम है। ( अर्थात्‌ श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेमके बिना कोई इसको नहीं पा सकता )॥३८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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