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title: "बालकाण्ड दोहा 361"
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# बालकाण्ड · दोहा 361

श्रीरामचरित सुनने-गानेकी महिमा

**चौ०** 
> बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी॥  
> सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ॥१॥

भावार्थ: वामदेवजी और रघुकुलके गुरु ज्ञानी वसिष्ठजीने फिर विश्वामित्रजीकी कथा बखानकर कही। मुनिका सुन्दर यश सुनकर राजा मन-ही-मन अपने पुण्योंके प्रभावका बखान करने लगे॥ १ ॥

**चौ०** 
> बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ॥  
> जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा॥२॥

भावार्थ: आज्ञा हुई तब सब लोग [ अपने-अपने घरोंको ] लौटे। राजा दशरथजी भी पुत्रोंसहित महलमें गये। जहाँ-तहाँ सब श्रीरामचन्द्रजीके विवाहकी गाथाएँ गा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजीका पवित्र सुयश तीनों लोकोंमें छा गया॥ २ ॥

**चौ०** 
> आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें॥  
> प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू॥३॥

भावार्थ: जबसे श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आये, तबसे सब प्रकारका आनन्द अयोध्यामें आकर बसने लगा। प्रभुके विवाहमें जैसा आनन्द-उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और सर्पोंके राजा शेषजी भी नहीं कह सकते॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कबिकुल जीवनु पावन जानी। राम सीय जसु मंगल खानी॥  
> तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी॥४॥

भावार्थ: श्रीसीतारामजीके यशको कविकुलके जीवनको पवित्र करनेवाला और मङ्गलोंकी खान जानकर, इससे मैंने अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये कुछ ( थोड़ा-सा ) बखानकर कहा है॥ ४ ॥

**छं०** 
> निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो।  
> रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो॥  
> उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं।  
> बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं॥

भावार्थ: अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये तुलसीने रामका यश कहा है। [ नहीं तो ] श्रीरघुनाथजीका चरित्र अपार समुद्र है, किस कविने उसका पार पाया है ? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाहके मङ्गलमय उत्सवका वर्णन आदरके साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्रीजानकीजी और श्रीरामजीकी कृपासे सदा सुख पावेंगे।

**सो०** 
> सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।  
> तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु॥३६१॥

भावार्थ: श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजीके विवाह-प्रसङ्गको जो लोग प्रेमपूर्वक गायें-सुनेंगे, उनके लिये सदा उत्साह ( आनन्द )-ही-उत्साह है; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीका यश मङ्गलका धाम है॥ ३६१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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