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title: "बालकाण्ड दोहा 353"
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# बालकाण्ड · दोहा 353

**चौ०** 
> बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें॥  
> नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा॥१॥

भावार्थ: राजाने अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदयसे पुत्रोंको और सारी सम्पत्तिको सामने रखकर [ उन्हें स्वीकार करनेके लिये ] विनती की। परन्तु मुनिराजने [ पुरोहितके नाते ] केवल अपना नेग माँग लिया और बहुत तरहसे आशीर्वाद दिया॥ १ ॥

**चौ०** 
> उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता॥  
> बिप्रबधू सब भूप बोलाईं। चैल चारु भूषन पहिराईं॥२॥

भावार्थ: फिर सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें रखकर गुरु वसिष्ठजी हर्षित होकर अपने स्थानको गये। राजाने सब ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंको बुलवाया और उन्हें सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण पहनाये॥ २ ॥

**चौ०** 
> बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं॥  
> नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरूप भूपमनि देहीं॥३॥

भावार्थ: फिर सब सुआसिनियोंको ( नगरभरकी सौभाग्यवती बहिन, बेटी, भानजी आदिको ) बुलवा लिया और उनकी रुचि समझकर [ उसीके अनुसार ] उन्हें पहिरावनी दी। नेगी लोग सब अपना-अपना नेग-जोग लेते और राजाओंके शिरोमणि दशरथजी उनकी इच्छाके अनुसार देते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने॥  
> देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू॥४॥

भावार्थ: जिन मेहमानोंको प्रिय और पूजनीय जाना, उनका राजाने भलीभाँति सम्मान किया। देवगण श्रीरघुनाथजीका विवाह देखकर, उत्सवकी प्रशंसा करके फूल बरसाते हुए— ॥ ४ ॥

**दो०** 
> चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ।  
> कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ॥३५३॥

भावार्थ: नगाड़े बजाकर और [ परम ] सुख प्राप्त कर अपने-अपने लोकोंको चले। वे एक-दूसरेसे श्रीरामजीका यश कहते जाते हैं। हृदयमें प्रेम समाता नहीं है॥ ३५३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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