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title: "बालकाण्ड दोहा 35"
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# बालकाण्ड · दोहा 35

**चौ०** 
> दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना॥  
> नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारदा बिमल मति॥१॥

भावार्थ: वेद-पुराण कहते हैं कि श्रीसरयूजीका दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान पापोंको हरता है। यह नदी बड़ी ही पवित्र है, इसकी महिमा अनन्त है, जिसे विमल बुद्धिवाली सरस्वतीजी भी नहीं कह सकतीं॥ १ ॥

**चौ०** 
> राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि॥  
> चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजें तनु नहिं संसारा॥२॥

भावार्थ: यह शोभायमान अयोध्यापुरी श्रीरामचन्द्रजीके परमधामकी देनेवाली है, सब लोकोंमें प्रसिद्ध है और अत्यन्त पवित्र है। जगत्‌में [ अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज ] चार खानि ( प्रकार ) के अनन्त जीव हैं, इनमेंसे जो कोई भी अयोध्याजीमें शरीर छोड़ते हैं वे फिर संसारमें नहीं आते ( जन्म-मृत्युके चक्करसे छूटकर भगवान्‌के परमधाममें निवास करते हैं )॥ २ ॥

**चौ०** 
> सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी॥  
> बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा॥३॥

भावार्थ: इस अयोध्यापुरीको सब प्रकारसे मनोहर, सब सिद्धियोंकी देनेवाली और कल्याणकी खान समझकर मैंने इस निर्मल कथाका आरम्भ किया, जिसके सुननेसे काम, मद और दम्भ नष्ट हो जाते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥  
> मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई॥४॥

भावार्थ: इसका नाम रामचरितमानस है, जिसके कानोंसे सुनते ही शान्ति मिलती है। मनरूपी हाथी विषयरूपी दावानलमें जल रहा है, वह यदि इस रामचरितमानसरूपी सरोवरमें आ पड़े तो सुखी हो जाय॥ ४ ॥

**चौ०** 
> रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन॥  
> त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन॥५॥

भावार्थ: यह रामचरितमानस मुनियोंका प्रिय है, इस सुहावने और पवित्र मानसकी शिवजीने रचना की। यह तीनों प्रकारके दोषों, दुःखों और दरिद्रताको तथा कलियुगकी कुचालों और सब पापोंका नाश करनेवाला है॥ ५ ॥

**चौ०** 
> रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥  
> तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥६॥

भावार्थ: श्रीमहादेवजीने इसको रचकर अपने मनमें रखा था और सुअवसर पाकर पार्वतीजीसे कहा। इसीसे शिवजीने इसको अपने हृदयमें देखकर और प्रसन्न होकर इसका सुन्दर ‘रामचरितमानस’ नाम रखा॥ ६ ॥

**चौ०** 
> कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई॥७॥

भावार्थ: मैं उसी सुख देनेवाली सुहावनी रामकथाको कहता हूँ, हे सज्जनो! आदरपूर्वक मन लगाकर इसे सुनिये॥ ७ ॥

**दो०** 
> जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।  
> अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु॥३५॥

भावार्थ: यह रामचरितमानस जैसा है, जिस प्रकार बना है और जिस हेतुसे जगत्‌में इसका प्रचार हुआ, अब वही सब कथा मैं श्रीउमा-महेश्वरका स्मरण करके कहता हूँ॥ ३५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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