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title: "बालकाण्ड दोहा 349"
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# बालकाण्ड · दोहा 349

**चौ०** 
> करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा॥  
> भूषन मनि पट नाना जाती। करहिं निछावरि अगनित भाँती॥१॥

भावार्थ: वे बार-बार आरती कर रही हैं। उस प्रेम और महान् आनन्दको कौन कह सकता है! अनेकों प्रकारके आभूषण, रत्न और वस्त्र तथा अगणित प्रकारकी अन्य वस्तुएँ निछावर कर रही हैं॥ १॥

**चौ०** 
> बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी॥  
> पुनि पुनि सीय राम छबि देखी। मुदित सफल जग जीवन लेखी॥२॥

भावार्थ: बहुओंसहित चारों पुत्रोंको देखकर माताएँ परमानन्दमें मग्न हो गयीं। सीताजी और श्रीरामजीकी छबिको बार-बार देखकर वे जगत्‌में अपने जीवनको सफल मानकर आनन्दित हो रही हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही॥  
> बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा॥३॥

भावार्थ: सखियाँ सीताजीके मुखको बार-बार देखकर अपने पुण्योंकी सराहना करती हुई गान कर रही हैं। देवता क्षण-क्षणमें फूल बरसाते, नाचते, गाते तथा अपनी-अपनी सेवा समर्पण करते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं॥  
> देत न बनहिं निपट लघु लागीं। एकटक रहीं रूप अनुरागीं॥४॥

भावार्थ: चारों मनोहर जोड़ियोंको देखकर सरस्वतीने सारी उपमाओंको खोज डाला; पर कोई उपमा देते नहीं बनी, क्योंकि उन्हें सभी बिलकुल तुच्छ जान पड़ीं। तब हारकर वे भी श्रीरामजीके रूपमें अनुरक्त होकर एकटक देखती रह गयीं॥ ४ ॥

**दो०** 
> निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत।  
> बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत॥३४९॥

भावार्थ: वेदकी विधि और कुलकी रीति करके अर्घ्य-पाँवड़े देती हुई बहुओंसमेत सब पुत्रोंको परछन करके माताएँ महलमें लिवा चलीं॥ ३४९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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