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title: "बालकाण्ड दोहा 347"
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# बालकाण्ड · दोहा 347

**चौ०** 
> धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥  
> सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं॥१॥

भावार्थ: धूपके धूएँसे आकाश ऐसा काला हो गया है मानो सावनके बादल घुमड़-घुमड़कर छा गये हों। देवता कल्पवृक्षके फूलोंकी मालाएँ बरसा रहे हैं। वे ऐसी लगती हैं मानो बगुलोंकी पाँति मनको [ अपनी ओर ] खींच रही हो॥ १ ॥

**चौ०** 
> मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे॥  
> प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि॥२॥

भावार्थ: सुन्दर मणियोंसे बने बंदनवार ऐसे मालूम होते हैं मानो इन्द्रधनुष सजाये हों। अटारियोंपर सुन्दर और चपल स्त्रियाँ प्रकट होती और छिप जाती हैं ( आती-जाती हैं ); वे ऐसी जान पड़ती हैं मानो बिजलियाँ चमक रही हों॥ २ ॥

**चौ०** 
> दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा॥  
> सुर सुगंध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी॥३॥

भावार्थ: नगाड़ोंकी ध्वनि मानो बादलोंकी घोर गर्जना है। याचकगण पपीहे, मेढक और मोर हैं। देवता पवित्र सुगन्धरूपी जल बरसा रहे हैं, जिससे खेतीके समान नगरके सब स्त्री-पुरुष सुखी हो रहे हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> समउ जानि गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा॥  
> सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा॥४॥

भावार्थ: [ प्रवेशका ] समय जानकर गुरु वसिष्ठजीने आज्ञा दी। तब रघुकुलमणि महाराज दशरथजीने शिवजी, पार्वतीजी और गणेशजीका स्मरण करके समाजसहित आनन्दित होकर नगरमें प्रवेश किया॥ ४॥

**दो०** 
> होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ।  
> बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ॥३४७॥

भावार्थ: शकुन हो रहे हैं, देवता दुन्दुभी बजा-बजाकर फूल बरसा रहे हैं। देवताओंकी स्त्रियाँ आनन्दित होकर सुन्दर मङ्गलगीत गा-गाकर नाच रही हैं॥ ३४७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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