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title: "बालकाण्ड दोहा 346"
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# बालकाण्ड · दोहा 346

**चौ०** 
> मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता॥  
> राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं॥१॥

भावार्थ: सुख और महान् आनन्दसे विवश होनेके कारण सब माताओंके शरीर शिथिल हो गये हैं, उनके चरण चलते नहीं हैं। श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनोंके लिये वे अत्यन्त अनुरागमें भरकर परछनका सब सामान सजाने लगीं॥ १ ॥

**चौ०** 
> बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे॥  
> हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला॥२॥

भावार्थ: अनेकों प्रकारके बाजे बजते थे। सुमित्राजीने आनन्दपूर्वक मङ्गलसाज सजाये। हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी आदि मङ्गलकी मूल वस्तुएँ,॥ २॥

**चौ०** 
> अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा॥  
> छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए॥३॥

भावार्थ: तथा अक्षत ( चावल ), अँखुए, गोरोचन, लावा और तुलसीकी सुन्दर मंजरियाँ सुशोभित हैं। नाना रंगोंसे चित्रित किये हुए सहज सुहावने सुवर्णके कलश ऐसे मालूम होते हैं, मानो कामदेवके पक्षियोंने घोंसले बनाये हों॥ ३॥

**चौ०** 
> सगुन सुगंध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी॥  
> रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना॥४॥

भावार्थ: शकुनकी सुगन्धित वस्तुएँ बखानी नहीं जा सकतीं। सब रानियाँ सम्पूर्ण मङ्गल साज सज रही हैं। बहुत प्रकारकी आरती बनाकर वे आनन्दित हुईं सुन्दर मङ्गलगान कर रही हैं॥ ४॥

**दो०** 
> कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात।  
> चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात॥३४६॥

भावार्थ: सोनेके थालोंको माङ्गलिक वस्तुओंसे भरकर अपने कमलके समान ( कोमल ) हाथोंमें लिये हुए माताएँ आनन्दित होकर परछन करने चलीं। उनके शरीर पुलकावलीसे छा गये हैं॥ ३४६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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