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title: "बालकाण्ड दोहा 345"
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# बालकाण्ड · दोहा 345

**चौ०** 
> भूप भवनु तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा॥  
> मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई॥१॥

भावार्थ: उस समय राजमहल [ अत्यन्त ] शोभित हो रहा था। उसकी रचना देखकर कामदेवका भी मन मोहित हो जाता था। मङ्गलशकुन, मनोहरता, ऋद्धि-सिद्धि, सुख, सुहावनी सम्पत्ति॥ १ ॥

**चौ०** 
> जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ गृहँ छाए॥  
> देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही॥२॥

भावार्थ: और सब प्रकारके उत्साह ( आनन्द ) मानो सहज सुन्दर शरीर धर-धरकर दशरथजीके घरमें छा गये हैं। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके दर्शनोंके लिये भला कहिये किसे लालसा न होगी ?॥ २ ॥

**चौ०** 
> जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासिनि॥  
> सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती॥३॥

भावार्थ: सुहागिनी स्त्रियाँ झुंड-की-झुंड मिलकर चलीं, जो अपनी छबिसे कामदेवकी स्त्री रतिका भी निरादर कर रही हैं। सभी सुन्दर मङ्गलद्रव्य एवं आरती सजाये हुए गा रही हैं, मानो सरस्वतीजी ही बहुत-से वेष धारण किये गा रही हों॥ ३ ॥

**चौ०** 
> भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई॥  
> कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेमबिबस तन दसा बिसारीं॥४॥

भावार्थ: राजमहलमें [ आनन्दके मारे ] शोर मच रहा है। उस समयका और सुखका वर्णन नहीं किया जा सकता। कौसल्याजी आदि श्रीरामचन्द्रजीकी सब माताएँ प्रेमके विशेष वश होनेसे शरीरकी सुध भूल गयीं॥ ४॥

**दो०** 
> दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारि।  
> प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि॥३४५॥

भावार्थ: गणेशजी और त्रिपुरारि शिवजीका पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणोंको बहुत-सा दान दिया। वे ऐसी परम प्रसन्न हुईं, मानो अत्यन्त दरिद्री चारों पदार्थ पा गया हो॥ ३४५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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