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title: "बालकाण्ड दोहा 344"
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# बालकाण्ड · दोहा 344

**चौ०** 
> हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे॥  
> झाँझि बिरव डिंडिमी सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥१॥

भावार्थ: नगाड़ोंपर चोटें पड़ने लगीं; सुन्दर ढोल बजने लगे। भेरी और शङ्खकी बड़ी आवाज हो रही है; हाथी-घोड़े गरज रहे हैं। विशेष शब्द करनेवाली झाँझें, सुहावनी डफलियाँ तथा रसीले रागसे शहनाइयाँ बज रही हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता॥  
> निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे॥२॥

भावार्थ: बारातको आती हुई सुनकर नगरनिवासी प्रसन्न हो गये। सबके शरीरोंपर पुलकावली छा गयी। सबने अपने-अपने सुन्दर घरों, बाजारों, गलियों, चौराहों और नगरके द्वारोंको सजाया॥ २ ॥

**चौ०** 
> गलीं सकल अरगजाँ सिंचाईं। जहँ तहँ चौकें चारु पुराईं॥  
> बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना॥३॥

भावार्थ: सारी गलियाँ अरगजेसे सिंचायी गयीं, जहाँ-तहाँ सुन्दर चौक पुराये गये। तोरणों, ध्वजा-पताकाओं और मण्डपोंसे बाजार ऐसा सजा कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला॥  
> लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी॥४॥

भावार्थ: फलसहित सुपारी, केला, आम, मौलसिरी, कदम्ब और तमालके वृक्ष लगाये गये। वे लगे हुए सुन्दर वृक्ष [ फलोंके भारसे ] पृथ्वीको छू रहे हैं। उनके मणियोंके थाले बड़ी सुन्दर कारीगरीसे बनाये गये हैं॥ ४ ॥

**दो०** 
> बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।  
> सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि॥३४४॥

भावार्थ: अनेक प्रकारके मङ्गल-कलश घर-घर सजाकर बनाये गये हैं। श्रीरघुनाथजीकी पुरी ( अयोध्या ) को देखकर ब्रह्मा आदि सब देवता सिहाते हैं॥ ३४४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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