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title: "बालकाण्ड दोहा 34"
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# बालकाण्ड · दोहा 34

मानसनिर्माणकी तिथि · मानसका रूप और माहात्म्य

**चौ०** 
> एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी॥  
> पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी॥१॥

भावार्थ: इस प्रकार सब संदेहोंको दूर करके और श्रीगुरुजीके चरणकमलोंकी रजको सिरपर धारण करके मैं पुनः हाथ जोड़कर सबकी विनती करता हूँ, जिससे कथाकी रचनामें कोई दोष स्पर्श न करने पावे॥ १ ॥

**चौ०** 
> सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥  
> संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥२॥

भावार्थ: अब मैं आदरपूर्वक श्रीशिवजीको सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी निर्मल कथा कहता हूँ। श्रीहरिके चरणोंपर सिर रखकर संवत् १६३१ में इस कथाका आरम्भ करता हूँ॥ २ ॥

**चौ०** 
> नौमी भौम बार मधुमासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥  
> जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं॥३॥

भावार्थ: चैत्र मासकी नवमी तिथि मंगलवारको श्रीअयोध्याजीमें यह चरित्र प्रकाशित हुआ। जिस दिन श्रीरामजीका जन्म होता है, वेद कहते हैं कि उस दिन सारे तीर्थ वहाँ ( श्रीअयोध्याजीमें ) चले आते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा॥  
> जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना॥४॥

भावार्थ: असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता सब अयोध्याजीमें आकर श्रीरघुनाथजीकी सेवा करते हैं। बुद्धिमान्‌ लोग जन्मका महोत्सव मनाते हैं और श्रीरामजीकी सुन्दर कीर्तिका गान करते हैं॥ ४ ॥

**दो०** 
> मज्जहिं सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर।  
> जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर॥३४॥

भावार्थ: सज्जनोंके बहुत-से समूह उस दिन श्रीसरयूजीके पवित्र जलमें स्नान करते हैं और हृदयमें सुन्दर श्यामशरीर श्रीरघुनाथजीका ध्यान करके उनके नामका जप करते हैं॥ ३४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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