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title: "बालकाण्ड दोहा 339"
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lang: "hi"
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# बालकाण्ड · दोहा 339

**चौ०** 
> बहुबिधि भूप सुता समुझाईं। नारिधरमु कुलरीति सिखाईं॥  
> दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे॥१॥

भावार्थ: राजाने पुत्रियोंको बहुत प्रकारसे समझाया और उन्हें स्त्रियोंका धर्म और कुलकी रीति सिखायी। बहुत-से दासी-दास दिये, जो सीताजीके प्रिय और विश्वासपात्र सेवक थे॥ १ ॥

**चौ०** 
> सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी॥  
> भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा॥२॥

भावार्थ: सीताजीके चलते समय जनकपुरवासी व्याकुल हो गये। मङ्गलकी राशि शुभ शकुन हो रहे हैं। ब्राह्मण और मन्त्रियोंके समाजसहित राजा जनकजी उन्हें पहुँचानेके लिये साथ चले॥ २ ॥

**चौ०** 
> समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे॥  
> दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे॥३॥

भावार्थ: समय देखकर बाजे बजने लगे। बरातियोंने रथ, हाथी और घोड़े सजाये। दशरथजीने सब ब्राह्मणोंको बुला लिया और उन्हें दान और सम्मानसे परिपूर्ण कर दिया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा॥  
> सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना॥४॥

भावार्थ: उनके चरणकमलोंकी धूलि सिरपर धरकर और आशिष पाकर राजा आनन्दित हुए और गणेशजीका स्मरण करके उन्होंने प्रस्थान किया। मङ्गलोंके मूल अनेकों शकुन हुए॥ ४ ॥

**दो०** 
> सुर प्रसून बरषहिं हरषि करहिं अपछरा गान।  
> चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान॥३३९॥

भावार्थ: देवता हर्षित होकर फूल बरसा रहे हैं और अप्सराएँ गान कर रही हैं। अवधपति दशरथजी नगाड़े बजाकर आनन्दपूर्वक अयोध्यापुरीको चले॥ ३३९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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