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title: "बालकाण्ड दोहा 338"
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# बालकाण्ड · दोहा 338

**चौ०** 
> सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥  
> ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥१॥

भावार्थ: जानकीने जिन तोता और मैनाको पाल-पोसकर बड़ा किया था और सोनेके पिंजड़ोंमें रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल होकर कह रहे हैं—वैदेही कहाँ हैं। उनके ऐसे वचनोंको सुनकर धीरज किसको नहीं त्याग देगा ( अर्थात्‌ सबका धैर्य जाता रहा )॥ १ ॥

**चौ०** 
> भए बिकल खग मृग एहि भाँती। मनुज दसा कैसें कहि जाती॥  
> बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए॥२॥

भावार्थ: जब पक्षी और पशुतक इस तरह विकल हो गये, तब मनुष्योंकी दशा कैसे कही जा सकती है! तब भाईसहित जनकजी वहाँ आये। प्रेमसे उमड़कर उनके नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया॥ २ ॥

**चौ०** 
> सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी॥  
> लीन्हि रायँ उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की॥३॥

भावार्थ: वे परम वैराग्यवान्‌ कहलाते थे; पर सीताजीको देखकर उनका भी धीरज भाग गया। राजाने जानकीजीको हृदयसे लगा लिया। [ प्रेमके प्रभावसे ] ज्ञानकी महान्‌ मर्यादा मिट गयी ( ज्ञानका बाँध टूट गया )॥ ३ ॥

**चौ०** 
> समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने॥  
> बारहिं बार सुता उर लाईं। सजि सुंदर पालकीं मगाईं॥४॥

भावार्थ: सब बुद्धिमान्‌ मन्त्री उन्हें समझाते हैं। तब राजाने विषाद करनेका समय न जानकर विचार किया। बारंबार पुत्रियोंको हृदयसे लगाकर सुन्दर सजी हुई पालकियाँ मँगवायी॥ ४ ॥

**दो०** 
> प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस।  
> कुअँरि चढ़ाईं पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस॥३३८॥

भावार्थ: सारा परिवार प्रेममें विवश है। राजाने सुन्दर मुहूर्त जानकर सिद्धिसहित गणेशजीका स्मरण करके कन्याओंको पालकियोंपर चढ़ाया॥ ३३८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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