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title: "बालकाण्ड दोहा 336"
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# बालकाण्ड · दोहा 336

**चौ०** 
> देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं॥  
> रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई॥१॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखकर वे प्रेममें अत्यन्त मग्न हो गयीं और प्रेमके विशेष वश होकर बार-बार चरणों लगीं। हृदयमें प्रीति छा गयी, इससे लज्जा नहीं रह गयी। उनके स्वाभाविक स्नेहका वर्णन किस तरह किया जा सकता है॥ १ ॥

**चौ०** 
> भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए॥  
> बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी॥२॥

भावार्थ: उन्होंने भाइयोंसहित श्रीरामजीको उबटन करके स्नान कराया और बड़े प्रेमसे षट्‌रस भोजन कराया। सुअवसर जानकर श्रीरामचन्द्रजी शील, स्नेह और संकोचभरी वाणी बोले— ॥ २ ॥

**चौ०** 
> राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए॥  
> मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू॥३॥

भावार्थ: महाराज अयोध्यापुरीको चलना चाहते हैं, उन्होंने हमें विदा होनेके लिये यहाँ भेजा है। हे माता! प्रसन्न मनसे आज्ञा दीजिये और हमें अपने बालक जानकर सदा स्नेह बनाये रखियेगा॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू॥  
> हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही॥४॥

भावार्थ: इन वचनोंको सुनते ही रनिवास उदास हो गया। सासुएँ प्रेमवश बोल नहीं सकतीं । उन्होंने सब कुमारियोंको हृदयसे लगा लिया और उनके पतियोंको सौंपकर बहुत विनती की॥ ४॥

**छं०** 
> करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै।  
> बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै॥  
> परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी।  
> तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी॥

भावार्थ: विनती करके उन्होंने सीताजीको श्रीरामचन्द्रजीको समर्पित किया और हाथ जोड़कर बार-बार कहा—हे तात! हे सुजान! मैं बलि जाती हूँ, तुमको सबकी गति ( हाल ) मालूम है। परिवारको, पुरवासियोंको, मुझको और राजाको सीता प्राणोंके समान प्रिय है, ऐसा जानियेगा। हे तुलसीके स्वामी! इसके शील और स्नेहको देखकर इसे अपनी दासी करके मानियेगा।

**सो०** 
> तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय।  
> जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन॥३३६॥

भावार्थ: तुम पूर्णकाम हो, सुजानशिरोमणि हो और भावप्रिय हो ( तुम्हें प्रेम प्यारा है )। हे राम! तुम भक्तोंके गुणोंको ग्रहण करनेवाले, दोषोंको नाश करनेवाले और दयाके धाम हो॥ ३३६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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