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title: "बालकाण्ड दोहा 335"
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# बालकाण्ड · दोहा 335

**चौ०** 
> चारिउ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए॥  
> कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू॥१॥

भावार्थ: स्वभावसे ही सुन्दर चारों भाइयोंको देखनेके लिये नगरके स्त्री-पुरुष दौड़े। कोई कहता है—आज ये जाना चाहते हैं। विदेहने विदाईका सब सामान तैयार कर लिया है॥ १॥

**चौ०** 
> लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी॥  
> को जानै केहिं सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी॥ २ ॥

भावार्थ: राजाके चारों पुत्र, इन प्यारे मेहमानोंके [ मनोहर ] रूपको नेत्र भरकर देख लो। हे सयानी! कौन जाने, किस पुण्यसे विधाताने इन्हें यहाँ लाकर हमारे नेत्रोंका अतिथि किया है॥ २॥

**चौ०** 
> मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा॥  
> पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसें॥३॥

भावार्थ: मरनेवाला जिस तरह अमृत पा जाय, जन्मका भूखा कल्पवृक्ष पा जाय और नरकमें रहनेवाला ( या नरकके योग्य ) जीव जैसे भगवान्‌के परमपदको प्राप्त हो जाय, हमारे लिये इनके दर्शन वैसे ही हैं॥ ३॥

**चौ०** 
> निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू॥  
> एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता॥४॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीकी शोभाको निरखकर हृदयमें धर लो। अपने मनको साँप और इनकी मूर्तिको मणि बना लो। इस प्रकार सबको नेत्रोंका फल देते हुए सब राजकुमार राजमहलमें गये॥ ४॥

**दो०** 
> रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु।  
> करहिं निछावरि आरती महा मुदित मन सासु॥३३५॥

भावार्थ: रूपके समुद्र सब भाइयोंको देखकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा। सासुएँ महान्‌ प्रसन्न मनसे निछावर और आरती करती हैं॥ ३३५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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