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title: "बालकाण्ड दोहा 334"
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# बालकाण्ड · दोहा 334

**चौ०** 
> सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई॥  
> चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं॥१॥

भावार्थ: इस प्रकार सब सामान सजाकर राजा जनकने अयोध्यापुरीको भेज दिया। बारात चलेगी, यह सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो गयीं, मानो थोड़े जलमें मछलियाँ छटपटा रही हों॥ १॥

**चौ०** 
> पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं॥  
> होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी॥२॥

भावार्थ: वे बार-बार सीताजीको गोद कर लेती हैं और आशीर्वाद देकर सिखावन देती हैं—तुम सदा अपने पतिकी प्यारी होओ, तुम्हारा सोहाग अचल हो; हमारी यही आशिष है॥ २॥

**चौ०** 
> सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू॥  
> अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी॥३॥

भावार्थ: सास, ससुर और गुरुकी सेवा करना। पतिका रुख देखकर उनकी आज्ञाका पालन करना। सयानी सखियाँ अत्यन्त स्नेहके वश कोमल वाणीसे स्त्रियोंके धर्म सिखलाती हैं॥ ३॥

**चौ०** 
> सादर सकल कुअँरि समुझाईं। रानिन्ह बार बार उर लाईं॥  
> बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं॥४॥

भावार्थ: आदरके साथ सब पुत्रियोंको [ स्त्रियोंके धर्म ] समझाकर रानियोंने बार-बार उन्हें हृदयसे लगाया। माताएँ फिर-फिर भेंटती और कहती हैं कि ब्रह्माने स्त्रीजातिको क्यों रचा॥ ४॥

**दो०** 
> तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु।  
> चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु॥३३४॥

भावार्थ: उसी समय सूर्यवंशके पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी भाइयोंसहित प्रसन्न होकर विदा करानेके लिये जनकजीके महलको चले॥ ३३४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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