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title: "बालकाण्ड दोहा 333"
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# बालकाण्ड · दोहा 333

**चौ०** 
> पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता॥  
> सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने॥१॥

भावार्थ: जनकपुरवासियोंने सुना कि बारात जायगी, तब वे व्याकुल होकर एक-दूसरेसे बात पूछने लगे। जाना सत्य है, यह सुनकर सब ऐसे उदास हो गये मानो सन्ध्याके समय कमल सकुचा गये हों॥ १॥

**चौ०** 
> जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती॥  
> बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना॥२॥

भावार्थ: आते समय जहाँ-जहाँ बराती ठहरे थे, वहाँ-वहाँ बहुत प्रकारका सीधा ( रसोईका सामान ) भेजा गया। अनेकों प्रकारके मेवे, पकवान और भोजनकी सामग्री जो बखानी नहीं जा सकती— ॥ २॥

**चौ०** 
> भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठईं जनक अनेक सुसारा॥  
> तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा॥३॥

भावार्थ: अनगिनत बैलों और कहारोंपर भर-भरकर ( लाद-लादकर ) भेजी गयी। साथ ही जनकजीने अनेकों सुन्दर शय्याएँ ( पलँग ) भेजीं । एक लाख घोड़े और पचीस हजार रथ सब नखसे शिखातक ( ऊपरसे नीचेतक ) सजाये हुए, ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे॥  
> कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना॥४॥

भावार्थ: दस हजार सजे हुए मतवाले हाथी, जिन्हें देखकर दिशाओंके हाथी भी लजा जाते हैं, गाड़ियोंमें भर-भरकर सोना, वस्त्र और रत्न ( जवाहिरात ) और भैंस, गाय तथा और भी नाना प्रकारकी चीजें दीं॥ ४॥

**दो०** 
> दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि।  
> जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि॥३३३॥

भावार्थ: [ इस प्रकार ] जनकजीने फिरसे अपरिमित दहेज दिया, जो कहा नहीं जा सकता और जिसे देखकर लोकपालोंके लोकोंकी सम्पदा भी थोड़ी जान पड़ती थी॥ ३३३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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