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title: "बालकाण्ड दोहा 332"
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# बालकाण्ड · दोहा 332

**चौ०** 
> जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती॥  
> दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा॥१॥

भावार्थ: राजा दशरथजी जनकजीके स्नेह, शील, करनी और ऐश्वर्यकी सब प्रकारसे सराहना करते हैं। प्रतिदिन [ सबेरे ] उठकर अयोध्यानरेश विदा माँगते हैं। पर जनकजी उन्हें प्रेमसे रख लेते हैं॥ १॥

**चौ०** 
> नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई॥  
> नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू॥२॥

भावार्थ: आदर नित्य नया बढ़ता जाता है। प्रतिदिन हजारों प्रकारसे मेहमानी होती है। नगरमें नित्य नया आनन्द और उत्साह रहता है, दशरथजीका जाना किसीको नहीं सुहाता॥ २॥

**चौ०** 
> बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती॥  
> कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई॥३॥

भावार्थ: इस प्रकार बहुत दिन बीत गये, मानो बराती स्नेहकी रस्सीसे बँध गये हैं। तब विश्वामित्रजी और शतानन्दजीने जाकर राजा जनकको समझाकर कहा— ॥ ३॥

**चौ०** 
> अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू॥  
> भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए॥४॥

भावार्थ: यद्यपि आप स्नेह [ वश उन्हें ] नहीं छोड़ सकते, तो भी अब दशरथजीको आज्ञा दीजिये। ‘हे नाथ! बहुत अच्छा’ कहकर जनकजीने मन्त्रियोंको बुलवाया। वे आये और ‘जय जीव’ कहकर उन्होंने मस्तक नवाया॥ ४॥

**दो०** 
> अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ।  
> भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ॥३३२॥

भावार्थ: [ जनकजीने कहा— ] अयोध्यानाथ चलना चाहते हैं, भीतर ( रनिवासमें ) खबर कर दो। यह सुनकर मन्त्री, ब्राह्मण, सभासद और राजा जनक भी प्रेमके वश हो गये॥ ३३२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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